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Saturday, October 26, 2019

अनुवाद - कुछ नए ग्रहयोग -3 (पु.ल. देशपांडे )

कुछ नए ग्रहयोग  (लेकिन बहुत से अनिष्ट) भाग-3


समस्त-स्त्रीवृन्द-परपुरुष-विवाहित-वैषम्य-योग

इस योग का नाम कुछ बड़ा है. लेकिन अपने नाम की तरह  ही यह योग बलशाली है. सुविधा के लिए यहाँ हम इसे वैषम्ययोग कहेंगे. इस कुंडली के सारे ग्रह नीच स्थान में होते हैं. दुनिया की प्रत्येक सुन्दर स्त्री परपुरुष के साथ विवाहित हो गई है, ऐसा इस योग पर पैदा हुए पुरुष मानते हैं. 

स्वयं को लेकर जबरदस्त गलतफहमी इनके जीवन का आधार होती है. इनकी किसी भी बात की शुरुआत “यदि मैं होता तो...” से होती है. इस तरह के व्यक्तियों को कोई कहे कि “क्या सुंदर चांदनी रात है.” तो चाँद से भी वैषम्य व्यक्त कर दें. 

इस योग पर जन्मे एक व्यक्ति की कुंडली का हमने बारीकी से अध्ययन किया. इनकी कुंडली में पराक्रम का कोई ग्रह नहीं था. हरदम तुलना करना इनके स्थाईभाव में शामिल था. इसी के ऑफिस की एक टाइपिस्ट लड़की ने साथ वाले क्लार्क से शादी रचाने पर उसकी शादी के मंडप में जाकर किसी से यह कहने से नहीं चूके “पता नहीं इस आदमी में इस लड़की ने क्या देख लिया? भगवान जाने !” 

वैषम्ययोग ग्रसित लोग नाटकों में अपना अभिनय पिटा जाने पर एक्टिंग के स्कूल खोल लेते हैं और अभिनय क्या है यह सिखाते रहते हैं.  उपन्यासकार नहीं बन पाते तो टीकाकार बन जाते हैं और वहाँ भी पिटा जाते हैं. प्यार में पिटा जाने पर स्त्रीजाति को नमकहराम कहते हैं. क्लर्की करते हुए जीवन भर प्रमोशन न होने पर “मक्खनबाजी” को गाली देते फिरते हैं. इनके लिए यह पहेली होती है कि हर पडोसी को अच्छी पत्नियां क्यों मिलती हैं. हमेशा महसूस करते होते हैं कि औरों के सूट अपने से बढ़िया सिले हैं.

जिन्दगी में हम हमेशा थर्डक्लास रहे यह मन ही मन समझ चुके होते हैं. समय से पहले खुद के बाल चले गए इस बात का दुःख मनाते रहते हैं. इन सारी कमियों का बदला ये दूसरों को परेशान कर लेते रहते हैं. खुद को जुकाम हो जाये तो  डॉक्टर पर उखड़ जाते हैं. इन लोगो का कोई इलाज नही. क्योंकि यह योग ही ऐसा है. लोकप्रिय चीजें इन्हें अच्छी नहीं लगतीं. इन्हें आम पसंद नहीं होता. 

ऐसे लोग चुटकुला सुना दें तो कोट की आस्तीन में से कॉकरोच निकल जाने जैसा महसूस होता है. क्योंकि इसमें ऑफिस के किसी “लोकप्रिय मजाकिया क्लर्क से हम ज्यादा मजाकिया हैं” यह बताने की कोशिश होती है और यह भी कि ‘’सोच लूं तो पचास जोक्स और सुना दूं.” रमी में इनका लक नहीं होता इसलिए ये उखड़े उखड़े से खेलते हैं और हार जाते हैं. 

वैषम्ययोग की कुंडली इन लोगों को चैन से बैठने नहीं देती. हर जगह टांग अड़ाने की इनकी कोशिश जारी रहती है लेकिन उस जगह भी हमेशा इनसे भी योग्य उम्मीदवार मौजूद होता है. ये इसी भ्रम में होते हैं कि सारी दुनिया इनके खिलाफ साजिश कर रही है. इन लोगों द्वारा किया गया प्रत्येक बिजनेस फ्लॉप हो जाता है. अप्रिय होने में इनकी करामत गजब की होती है. बस में ये पहले कंडक्टर से भिड़ जाते हैं, फिर पडोसी पैसेंजर से और बाद में बस कंपनी को गालियाँ देने लगते हैं.

गानों की महफिल में इन्हें सबसे आगे बैठना होता है, लेकिन वहाँ पहले ही अन्य लोग बैठे होते हैं तो व्यवस्थापकों से भिड़ जाते हैं. कभी भूलेभटके आगे की जगह मिल भी जाए तो गाने वाले उस्ताद जी ने पहचाना नहीं इस बात से चिढ़ जाते हैं. गाने वाली अगर महिला हो तो सारी रात वह इन्हें ही देखते हुए गाती रहे, ऐसी इनकी अपेक्षा होती है.

ऐसे योग का व्यक्ति पड़ोस में आ बैठे तो समझदार को चाहिए कि वह अपनी जगह बदल ले, दूर के स्टॉप तक का सफर हो तो अगले स्टॉप पर उतर बस बदल ले, विवाह समारोह में मिले तो मात्र इत्रगुलाब लेकर भोजन-खाना छोड़कर निकल जाये. इस कुंडली का मामला किसी से भी नहीं जमता. क्योंकि जहाँ किसी अंधे भिखारी के कटोरे में कोई एक रूपया भी डाल दे तो ये उससे द्वेष कर लें तो हाथ-पैरों से स्वस्थ आप जैसों से तो कहना ही क्या.

पादत्राणांगुष्ठायोग

वैषम्ययोग कुंडली के ठीक उलट ये कुण्डलियाँ होती है. वैषम्ययोग की कुंडलियों के ग्रह एक दुसरे के विरुद्ध कुढ़ते रहते हैं तो यहाँ एकदूसरे को बेवजह टांग मारकर मजे लेते रहते हैं. इस योग को पादत्राणांगुष्ठायोग कहने की वजह केवल यह है कि इस योग पर जन्मे व्यक्तियों की चप्पल का अंगूठा ऐन वक्त पर टूट जाता है. खासकर जब कहीं जाने की जल्दी हो और चप्पल नई हो इसके बावजूद अंगूठा टूट जाता है.

सिल्क की नईनवेली कमीज पर चाय ढुल जाती है, खुद सुपारी भी न खाते हों लेकिन शरीर पर पान के छींटे उड़ जाते हैं. ऐन वक्त पर पेन की स्याही ख़त्म होना यह इसी पादत्राणांगुष्ठायोग का फलित है. ठीक ऑफिस जाते समय इनकी गाड़ी का पहिया पंक्चर हो जाता है  और उसी दिन पर्स घर में छूटा हुआ होता है.  इनकी खरीदी हुई नई किताब में से पन्ने गायब रहते हैं, गाने की महफ़िल में जाने पर गायक का गला बैठा हुआ होता है. 

आप फिल्म देखने थियेटर में बैठे हों और ऐन मौके की जगह पर फिल्म की रील टूट जाये तो समझ लीजिये दर्शकों के बीच पादत्राणांगुष्ठायोगवाली जनता बैठी हुई है. इस योग से इन्हें छुटकारा नहीं. ये लोग बिरयानी–कोरमे की लालच में मुसलमान हो जाएँ तो अगले दिन से रोजे चालू हो जाएँगे. ऐसे लोगों ने बाजार जाना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि इनके लाये हुए बैंगन तो छोडो कद्दू में भी कीड़े निकलेंगे. 

इनकी जेब में रखी माचिस जलती नहीं, बीडी पर बंधा धागा खुल जाता है, मन्दिर से अनेक छातों में से इनका छाता एवं चप्पलों में से एक चप्पल चोरी चली जाती है और टूटे अंगूठे वाली चप्पल मुंह फैलाए पड़ी होती है. चप्पल की बजाय  सैंडल खरीदी हुई हो तो उसका बक्कल टूट जाता है. इस योग पर जन्में व्यक्तियों के कपड़े धोबी बजाय धोने के दाग लगाकर या जलाकर लाते हैं. धोबी बदल दिए जाएँ तब भी वह परम्परा नहीं टूटती.

ऐसे लोगों ने सफ़र भी टाल देना चाहिए. सामान लापता होना ही है. ऐसे योग पर जन्मे लोगों को गलत जगह पर अपना सही मत व्यक्त करने की खुजली चलती है. “वो काली कलूटी औरत देख रहे हो ?” यह उस महिला के पति से ही कह देते हैं. किसी भी पार्टी में किसी कि बेवकूफी का वर्णन करते हुए उस महिला या व्यक्ति का रिश्तेदार सामने ही बैठा हुआ है यह भूल जाते हैं और आफत बुला लेते हैं.

ऐसे लोगों को शादियों में मध्यस्थ के तौर पर बिलकुल भी नहीं रखना चाहिए. ये लड़के के बाप को ही पंडितजी समझ लेंगे और माँ को “और कितनी बार आइसक्रीम खाओगी?” ये पूछ कर जायेंगे. इन लोगों की नीयत खराब नहीं होती लेकिन हर बार गलत जगह पर बोल जाते हैं. मकान मालिक को किराया वसूली का मुनीम समझ उसे “मकान मालिक कैसा लुच्चा आदमी है” यह बताएँगे.
ऐन वक्त पर गड़बड़ी होना, इस योग का यही मुख्य फलित है. इस योग के लोगों का दोष इन्ही लोगों को बाधक होता है, अन्य लोगों को इससे परेशानी नहीं होती. चार लोगों की सभा के बीच जोरदार छींक आकर पाजामे का नाड़ा टूटने के बाद जो कुछ होता है, वही सब इनके मामले में जिंदगीभर चल रहा होता है. योग ही वैसा है, इससे छुटकारा नहीं.


द्वारघंटिकायोग

वास्तव में देखा जाये तो पादत्राणांगुष्ठायोग और द्वारघंटिकायोग इनमें उपरी तौर पर ख़ास फर्क नहीं. दरवाजे की घंटी बजे और पोस्टमैन मनीआर्डर लेकर आया होगा इस अपेक्षा से फटाफट दरवाजा खोलने पर...आया तो पोस्टमैन ही होता है लेकिन व्ही.पी. लेकर आया हुआ होता है. होठों तक आया प्याला पीने को न मिले इस तरह का यह विचित्र योग है. इस योग के व्यक्ति इंटरव्यू में सिलेक्ट हो जाते हैं लेकिन मेडिकल चेकअप में लटक जाते हैं.

इन सारे योगों के अतिरिक्त एकासन-योग, विरुद्ध वातायन-योग, गप्पभंगिका–योग आदि भी छोटे-बड़े योग होते हैं. एकासन-योग में ट्रेन अथवा बस के सफ़र में आपने पास की सीट खाली होते हुए भी सुन्दर पैसेंजर आपके पड़ोस में न बैठ कर किसी और के पड़ोस में जाकर बैठता है और अपने पड़ोस में डेढ़ सीट की जगह घेरने वाला सेठिया आ कर बैठ जाता है. विरुद्ध वातायन-योग में धूप या बारिश से बचने के लिए बस या ट्रेन में एक खिड़की को छोड़ दूसरी खिड़की के पास आप बैठते हैं, ठीक वहीँ धूप आती है. गप्पभंगिका-योग में आपकी गप्प की पोल कहना ख़त्म होने से पहले ही खुल जाती है. ख़ास कर यह रहस्य खोलने में घर के छोटे बच्चे अधिक सहायक होते हैं. आप चाय पीने की शुरुआत करने ही वाले होते हैं और तभी कोई मेहमान आ जाते हैं. “साहब बाथरूम गए हैं” यह बताने का कहकर आप अन्दर के कमरे में जा कर चाय पी कर आने वाले होते हैं. ऐसे समय चिरंजीव आगे बढ़कर मेहमान को बताते हैं, “पापा बात्लुम नई गए, वो तो अंदल चाय पी लए है”. इस पर उपाय एक ही है, बच्चों को बाथरूम में बंद कर गप्प मारें, लेकिन आखिर जो किस्मत में होगा वो होने से कोई रोक नहीं सकता.

समझदार लोग हमेशा ज्योतिष की सलाह से चलते हैं. परन्तु कुंडली में अच्छा ज्योतिषी मिलने का योग होना आवश्यक है.
(पु.ल.देशपांडे लिखित मराठी लेख "काही नवीन ग्रहयोग" का हिंदी रूपांतरण भाग-3...विवेक भावसार) 
भाग 1 > https://funkahi.blogspot.com/2019/10/1.html
भाग 2 > https://funkahi.blogspot.com/2019/10/2.html

अनुवाद - कुछ नए ग्रहयोग -2 (पु.ल. देशपांडे )

कुछ नए ग्रहयोग  (लेकिन बहुत से अनिष्ट) भाग-2 


अंत:क्रमांकयोग

बड़े शहरों में रहने वाले अधिकांश लोगों की कुंडली में यह योग होता ही है. इस योग का मुख्य फलित यह है कि  कतार में आधा घंटा खड़े रहने के बाद बस आती है, आप सरकते हुए आगे बढ़ते हैं, आप बस में कदम रख ही चुके होते हैं कि कंडक्टर घंटी बजाकर “नीचे उतरो, जगा नाय “ पुकार देता है. उसके बाद चार-पाँच बसेस बगैर रुके आपके सामने से गुजर जाती हैं. इसलिए आप क्यू छोड़कर टैक्सी ढूँढने निकलते हैं, तभी आधे से ज्यादा खाली बस आपकी आँखों के सामने से पूरा क्यू समेट कर ले जाती है और उधर आज ही टैक्सीवालों की हड़ताल होती है.

फिल्म शो के टिकट की खिड़की जो आपके मुंह पर ही बंद होती है वह भी इसी योग की वजह से. बत्तीस से बयालीस तक की कौनसी भी साइज की बनियान दुकान तो छोडो, पूरे मार्केट से खल्लास हुई रहती है. चप्पल की जो डिजाइन पसंद आती है, उस का साइज पैरों से मैच नहीं करता. सेल में अपने नाप की पैंटे ख़त्म हो चुकी होती हैं. आप को जो शर्ट का कपड़ा पसंद आता है पीस में पाव मीटर कम होता है. विवाह समारोह में आप पहुँचते हैं तब तक आइसक्रीम ख़त्म हो चुका होता है, फिर परिवार को बाहर अपने खर्चे से आइसक्रीम खिलाना पड़ता है. तभी आपके परिचित ऑफिस के सहयोगी रामबाबू अपने बच्चों को आपकी ओर ऊँगली दिखाते हुए कहते हैं, “देखो, वो अंकल आपको आइसक्रीम खिलाएंगे.” कुल मिलाकर शादी महँगी पड़ जाती है. अंत:क्रमांकयोग के परिणाम भयानक होते हैं. लोकल ट्रेन का सफ़र किस्मत में हो तो ट्रेन छूटना तय ही है. पीछे चलनेवाली घड़ी आगे कर लो तो लोकल देर से आती है और ऑफिस के लिए देर हो जाती है, और उसी दिन साहब राउंड लगा जाते हैं.

किसी दिन आप सचमुच फ्लू से पीड़ित होते हो, बुखार भी 103 तक चढ़ा हुआ होता है. सप्ताह भर की छुट्टी ली हुई होती है. शनिवार की रात बुखार उतर जाता है और रविवार की शाम बड़े दिनों बाद परिवार के साथ रमी खेलने बैठ जाते हो. पांच घंटे तक हारते रहने के बाद हैण्डरमी होती है. आप ख़ुशी से चिल्ला उठाते हैं “लगा कि नहीं झटका बच्चू ?”, ठीक उसी समय दरवाजे पर स्वास्थ्य की पूछताछ करने हेडक्लार्क और अकाऊटेंट  खड़े हुए होते हैं. बड़ी मुश्किल से कोई दांव जीतते ही बाजी पलट जाए, ये अंत:क्रमांकयोग ऐसा ही है. 

छुट्टी के दिन सपरिवार फिल्म देखने के लिए तैयार हो कर निकलने को हों तभी पिछले आठ-दस सालों से बिस्तर पकड़ी हुई सामनेवाले के घर की बुढ़िया चल बसी ये बताने पडोसी आ जाते हैं. चुपचाप कोट उतार कर रख देना होता है. बुढ़िया का निधन ऐसे समय बिलकुल बेमुहुरत का लगने लगता है.

हर बार किसी की  बुढिया ही चल बसे ये जरूरी नहीं. अवांछित रिश्तेदार आ जाते हैं. औरों के नहाने के समय अनवरत बहने वाला नल आपके समय सर पर लगे साबुन का  झाग आँखों में जाते ही टप-टप कर आखरी आँसू टपका कर बंद हो जाता है. ऐसे लोग सलून में महीने के आखरी हफ्ते में जाते हैं तब भी इनके लिए जगह खाली नहीं मिलती और नाई “बस अभी हो जाती है, बैठो साब” कहकर वेटिंग में बिठा लेता है. तभी वहाँ बैठे फिल्मफेयर, मायापुरी, माधुरी, दैनिक सुप्रभात का भविष्यफल और कल के अखबार की शब्द्पहेली पहले से बैठी हुई दिखाई दे रही होती है. उनके निपटने तक आठ बज जाती है और दुकान बंद करने का समय हो जाता है इसलिए मालिक शटर गिरा देता है. इसमें से दोष किसी का भी नहीं होता, दोष होता है अंत:क्रमांकयोग का.

कनिष्ठभगिनीयोग

वधुपिता द्वारा दिखाने के लिए लाई हुई दोनों बहनों में से “जो भी पसंद हो उसे स्वीकार करें” यह खुला ऑफर मिला हुआ होता है. लेकिन बड़ीवाली देखने में अच्छी होते हुए वह आपको शायद पसंद न करे इस गैरवाजिब डर से रंग में उससे ज्यादा फ़ास्ट कलर और कदकाठी से मजबूत उसकी छोटी बहन को पसंद कर लिया जाता है. और बाद में “सही बोलूँ तो दीदी की आपसे शादी करने की कितनी इच्छा थी” ये वह कनिष्ठ भगिनी खुद के मंगलसूत्र से खेलते हुए बताती है. इसे ही कनिष्ठभगिनीयोग कहा जाता है. 

ऐसे व्यक्ति नोकरी मांगते समय सेठ की तनखा की अपेक्षा के जवाब में तीन हजार स्टार्ट का विज्ञापन पढ़ा होने के बावजूद “दो हजार” बताते हैं

“और महंगाई भत्ता अलग से चाहिए क्या ?”

“नहीं-नहीं” पसीना पोंछते हुए कहते हैं.

सेठ खुश होते हैं, पहला दिन है कहकर मसाले की चाय पिलाते हैं. इस चाय को याद करके यह लोग जिंदगीभर दो हजार पर काम करते रहते हैं. ऐसे लोग खुद के घर की घंटी बजाने से भी डरते हैं. खुद ही के घर में भोजनालय में बकाया उधारी वाले मेम्बरों की तरह छुप कर खाना खाते हैं. 

कनिष्ठभगिनीयोग पर जन्मा व्यक्ति एकदम ‘पंचर’ही हो कर पैदा होता है. इस तरह के व्यक्ति के लिए लोग उसके ज़िंदा होते हुए भी ‘अल्लाह की गाय’, ‘किसी के बीच में न पड़ने वाला’ आदि कैलासवासी विशेषणों के साथ संबोधित करते हैं. ऐसे व्यक्ति बच्चों की चड्डियों के नाड़े बांधते हैं. पत्नियों की साड़ियों की घड़ी कर रखते हैं. रविवार के दिन घर के जाले साफ़ करते हैं. इस योग वाले व्यक्ति बोलना तो बहुत चाहते हैं, लेकिन क्या बोलना है वह सामने वाले के चले जाने के बाद सूझता है. कोई चुटकुला भी रात को घर पर सुनाने के लिए सोच रखते हैं, लेकिन ‘थाली में सब्जी क्यों छोड़ दी’ इस शिकायत के बाद सुनाना भूल जाते हैं. 

कनिष्ठभगिनीयोग सौ में से साठ प्रतिशत कुंडलियों में पाया जाता है. समाज की गाड़ी इन्ही चिकने बेरिंग्स के बल पर चल रही होती है. ऐसे व्यक्ति बिना किसी शिकायत के दिन धकेल रहे होते हैं. कमोड में पानी नहीं आने पर बाल्टी ले कर पानी उंडेलते हैं, मकान मालिक से शिकायत नहीं करते. छुट्टी-अधिकारी योग से इनका पाला नहीं पड़ता. क्योंकि छुट्टी लेकर घर बैठ करें क्या यही सवाल हो तो छुट्टी किस बात की ? इनके घर चोर आ जाएँ तो पेटी उठाने में येही उनकी मदद करने लगेंगे. ऊपर से “श्रीमतीजी घर में नहीं हैं वरना एक चाय ही पीकर जाते...” या “जरा संभल कर, कहीं सर न टकरा जाये” आदि कहते हुए बिदा करते हैं. 

इन लोगों की नम्रता अपने शिखर पर होती है. इस योग पर जन्मे एक व्यक्ति ने रेडीमेड की दुकान में नए शर्ट की ट्रायल लेने आईने के सामने खडा हुआ तो हुए सामने कोई रौबीला पुरुष खड़ा है यह समझ कर अपने प्रतिबिम्ब को ही झुक कर सलाम कर डाला. संक्षेप में कहे तो ये पुरुष कुत्ते को भी “हऽऽऽट” न कहते हुए खुद ही अपना रास्ता बदल लेते हैं.

इनकी कुंडली के सारे गृह स्वगृह में ही होते हैं. किसी की भी किसी पर पाप दृष्टी नहीं होती. कोई ग्रह न वक्र होता हैं ना सीधा. इनका गुरु उच्च होते हुए भी घर ट्यूशन लेने आये मास्टर जैसा व्यवहार करता है. इन लोगों के जेब में नोट भी खोंस दिए जाएँ तो रुमाल निकालते हुए वे गिर पड़ते हैं. इस वर्ग के पुरुषों को अधिकतर आकाशवाणी योग की पत्नियाँ मिलती हैं.

आकाशवाणी योग

यह योग अधिकतर महिलाओं की कुंडली में पाया जाता है. इस प्रकार की महिलायें केवल और केवल बोलने का ही काम करतीं हैं. आकाशवाणी के किसी स्टेशन की तरह लगातार बोलना इनका काम होता है. सुबह 6 से रात 11 बजे तक. दोपहर दो घड़ी आँख लगती है उतनी ही देर मुंह को आराम.  

सुबह भजन गाती हैं, आपके दफ्तर जाने के पहले पिछली रात पड़ोसन को किस तरह खरी-खोटी सुनाई ये ख़बरें चलती हैं, दोपहर बिल्डिंग के महिला मंडल के कार्यक्रम में बोलती हैं. फिर किसी संगीत क्लास में गाना सीखना होता है. बच्चे स्कूल से लौटने के बाद उनके बालसभा के कार्यक्रम में बोलतीं हैं. शाम की सभा में समाचारों का आदान प्रदान होता है. रात में रूठने की लघु नाटिका होती है. 

आकाशवाणी की तरह इनके भी बहुरंगी कार्यक्रम होते हैं. दोपहर की शिकायतों का रात में पुनःप्रसारण होता है. उपस्थित मेहमानों के समक्ष बच्चों का विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत होता है. इतना ही नहीं “इन्हें” रविवार के दिन मार्केट भेजने से पहले बाजारभाव भी बताया जाता है. कामवाली बाई के साथ ग्रामीण सभा होती है. दूधवाले के साथ (मराठी गृहिणी का) हिंदी भाषा का पाठ होता है. किसी भावोत्कट लघुनाटिका के लिए बर्तनों के पटकने का साउंड इफेक्ट भी होता है. 

आकाशवाणी योग की कुंडली देखनेलायक होती है. सारे शुभग्रह सोये पड़े रहते हैं. कुंडली के पापग्रह स्वगृह में स्थित होते हैं. अनेक बार वह साले, साडू, जीजा आदि रूप धरकर आते हैं. ऐसे समय घर को आकाशवाणी के विशेष सप्ताह का स्वरुप प्राप्त होता है. यहाँ जामात दशमग्रह होते हुए भी पूरी तरह दुर्बल होता है. 

इस तरह की कुंडलियों की महिलाओं के और कनिष्ठभगिनियोग के पुरुषों के छत्तीस गुण मिलते हैं, इसलिए विवाह हो जाते हैं. उन 36 में से भी 35 गुण वधुपक्ष की ओर होते हैं और वरपक्ष का “चुप रहना” यह गुण उसे तार ले जाता है. ऐसे विवाह बहुत सफल होते हैं. क्योंकि आकाशवाणीयोगधारी परिवार का एक गुण वास्तविक आकाशवाणी की तरह ही होता है. बोलने वाले को सुनने की जरुरत नहीं होती. घर में कोई न हो और वॉल्यूम बढ़ा दो तो आकाशवाणी को पडोसी भी सुन सकते हैं.

(पु.ल.देशपांडे लिखित मराठी लेख "काही नवीन ग्रहयोग" का हिंदी रूपांतरण भाग-2 ... विवेक भावसार ) 
भाग -1> https://funkahi.blogspot.com/2019/10/1.html
भाग -3 > https://funkahi.blogspot.com/2019/10/3_26.html

अनुवाद - कुछ नए ग्रहयोग -1 (पु.ल. देशपांडे )


कुछ नए ग्रहयोग  (लेकिन बहुत से अनिष्ट)


पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने कुछ ही समय पहले फरर्टीज सिद्धांत, गम्परसन सिद्धांत, पार्किन्सन सिद्धांत आदि नये-नए सिद्धांत खोज निकाले हैं. गम्परसन के अनुसार, “दांतदर्द से जान जा रही हो ऐसे समय डेंटिस्ट की कुर्सी पर बैठते ही दांत-दर्द बंद हो जाये तब सवाल यह खडा हो जाता है कि डेंटिस्ट से किस बात का इलाज करवाएं ?” 

लेकिन मुझे उससे भी ज्यादा परेशानी तब होती है, जब डेंटिस्ट की कुर्सी पर गर्दन टिकाकर बैठते ही कहीं मैं यह हुकुम न चला बैठूं कि  "हाथ सीधा चलाना, उस्तरा उलटा मत खींचना”. क्योंकि आजकल दोनों एक ही सा पोशाख पहनते हैं और दोनों ही दुकानों से डेटॉल की एक सी गंध उठती रहती है.

पाश्चात्य लोग जिसे सिद्धांत कहते हैं, हम उसे ग्रहयोग कहते हैं, क्योंकि हम अपने भौतिकता या बुद्धिवाद पर घमंड नहीं करते. हमारा मानना है कि दुनिया में जो भी घटित होता है वह विधिलिखित लेख के अनुसार ही घटता है. पाश्चात्यों ने अभी जाकर चाँद की दिशा पकड़ी है. भारतीयों का तो वहाँ पहले ही से बेरोकटोक आना-जाना लगा हुआ है. 

हम चाँद पर जाएँ या हमारी कुंडली में उसे घर बनाने दिया जाए, अर्थ कहें या अनर्थ... मतलब एक ही है. लेकिन ज्योतिष पर अविश्वास दिखाने का आजकल फैशन चल पड़ा है. अन्य किसी फैशन की तरह इसे भी चोरी छुपे किया जाता है. लेकिन मुझे इसे चोरी छिपे करने आवश्यकता नहीं. मेरी ज्योतिष और ज्योतिषी, दोनों पर अनंत श्रद्धा है. एक बार भगवान् के सामने भले हाथ न फैलाऊँ, लेकिन ज्योतिषी के आगे हाथ फैलाये बिना नहीं रह सकता.

इस बात का मुझे गर्व है कि शनि, रवि, राहू, केतू, मंगल आदि शक्तिशाली ग्रहगण दुनिया की महान विभूतियों की कुंडली की भाँति मेरी कुंडली में भी घर किये हुए हैं. कभीकभार वे अपना घर छोड़ दुसरे घर में घुस जाते हैं, खुद का घर किराए पर उठा देते हैं, पुन: अपने घर में वापिस आ जाते हैं. कभी-कभी साहित्य के आलोचकों की तरह वक्री हो जाते हैं. तब उनकी दशा हमारी तरह ही हो जाती है. एक दुसरे का मुँह तक न देखने वाले शनि और गुरू, राजनीतिक पार्टियों के प्रतिस्पर्धी नेताओं की तरह एक-दूसरे पर अच्छी-बुरी नजर रखते हुए अचानक गठबंधन कर लेते हैं. कोई लोकप्रिय नेता जिस तरह कुछ वोटों से हार जाए ठीक उसी तरह कुछ ही अंशों से ये ग्रह मार खाते हैं. इनकी यह लीलाएं देखने में मैं व्यस्त हो जाता हूँ.

वराहमिहिर से लेकर पिछली गली के नुक्कड़ पर रहने वाले ज्योतिर्भूषण दयाशंकर शास्त्रीजी तक सभी ने इस शास्त्र का गहन अभ्यास किया हुआ है, कुण्डलियाँ बनाई हैं, भविष्य कथन किया है. लेकिन मुझे इन सबसे संतुष्टि नहीं हो रही थी. अपनी तरफ से इस शास्त्र में कुछ नया योगदान देने की पहले से मुझे रूचि रही है. मेरी कुंडली में ही वह योग है. पुरातन समय से हमारे यहाँ नवपंचमयोग, गुरूपुष्यामृतयोग, अमृतसिद्धियोग आदि अनेक योग चले आ ही रहे हैं, परन्तु मैंने कुछ नए योग खोज निकाले हैं. अब इन योगों पर कौनसे ग्रह को नियुक्त किया जाये यह काम अगली पीढ़ी का है. प्रस्तुत लेख में इन्हीं नये योगों पर प्रकाश डाला गया है. ज्योतिषशास्त्र पर श्रद्धा न रखने वाले इसे न देखें. पूर्वग्रहदूषित लोगों पर ज्योतिष की सत्ता नहीं चलती. एक बार शनि या मंगल का फटका पड़ जाए तब ही यह पूर्वग्रहदूषित लोग पुरानी अलमारियों-पेटियों में रखी अपनी कुंडली खोजने लगते हैं. तान प्रति नैष यत्न: !

कुंडलियों में पहले राजयोग, संततियोग आदि हुआ करते थे, नए जमाने में मंत्रियोग, संततिनियमनयोग, ब्लॉक अध्यक्ष-योग, विश्वविद्यालयीन-परीक्षकयोग, शासकीयपुरस्कारयोग आदि नए-नए योग आने लगे हैं. अष्टग्रहों में उसका भी विचार किया गया है, नए ज्योतिषी को केवल परदेशगमनयोग है इतना कहने भर से छुटकारा नहीं है, मंगल के भ्रमण का अध्ययन कर वह परदेशगमनयोग अमेरिका का है या चीन, जापान का, यह स्पष्ट बताना होता है.

ज्योतिषी दो तरह के होते हैं. एक जो कुंडली देख कर आदमी पहचानते हैं. दुसरे वे जो आदमी देख कर कुंडली बनाते हैं. हमारा अध्ययन दूसरे प्रकार का है. हम केवल कदकाठी देख कर राशि पहचान लेते हैं. प्रस्तुत लेख में यह नए ग्रहयोग दिए हैं. फिलहाल सुधीजनों के विचारार्थ चुनिन्दा योगों की चर्चा की जा रही है और उसके मुख्य फलित बताएं जा रहे हैं. एक बार योग और उनके फलित बता देने के बाद कुंडली में ग्रह फिट करना कोई कठिन काम नहीं.

जलशृंखलायोग

इस योग पर जन्मे जातक को हमेशा किसी विचित्र परिस्थिति से जूझना पड़ता है. उदाहरण के लिए – कमोड की जंजीर खींचने पर पानी न आना. (पुराने समय में फ्लश टैंक ऊपर की ओर बने होते थे जिनसे सर के ऊपर लटकती एक जंजीर द्वारा खींच कर फ़्लश करना पड़ता था) जंजीर खींचने पर आवाज के अतिरिक्त कुछ भी बाहर नहीं आता. ऐसे समय शिकायत करते रहने के बावजूद मकान मालिक भी ध्यान नहीं देता। किसी दिन आप बत्ती बुझाकर सोने के लिए जानेवाले होते हैं तभी मकान मालिक का वह  ‘आदमी’ आता है. 

मकान मालिक का यह आदमी, “आदमी” इसी सामान्य नाम से पहचाना जाता है. मकान मालिक से आप कुछ भी शिकायत करो तो, मेरा ‘आदमी’ आकर देख लेगा इतना कहकर मकान मालिक आपसे पीछा छुड़ा लेता है. ये “आदमी” छ-छः महीने तक नहीं आता है. उधर ये मालिक शिकायत सुनने के मूड में कभी होता ही नहीं. तब फिर एकाएक ये ‘आदमी’ प्रकट होता है. इन ‘आदमी लोगों का थोबड़ा रात में कुछ ‘जियादा’ हो गई हो टाइप का होना ऐसा कायदा है. वैसे भी ये ज्यादा ही हुई होती है. ये ‘’आदमी’’ लोग स्वच्छता और सभ्यता से एक ख़ास दूरी बनाये हुए होते हैं. तब उनका और इन जलशृंखलायोगवाले किरायेदार का संवाद कुछ इस तरह होता है –

“क्या कम्प्लेन है?”

“काहे की कम्प्लेन... कमोड की चेन खींचने के बाद भी पानी नहीं आ रहा है, हर महीने का किराया बोलो तो गिन कर ले जाते हो“

“वो सेठ को बोलो, मेरेको खालीपीली खिटखिट सुनने की आदत नी है “

इतना कह कर वह पापग्रह उस शौचगृह में जाता है, साँखल खींचता है और छः माह से सूखी पड़ी टंकी धड़ से पानी फेंकती है.

“साला ,,, टेनन लोगों को आदत ही हो गयेली है साला !”

उसके इस वाक्य को अनसुना कर, पानी आना शुरू हो गया है इस ख़ुशी में आप सोने चले जाते है. अगले दिन जंजीर खींचने पर फिर वही खडखडाहट. इसे ही कहते है जलशृंखलायोग. जिनकी कुंडली में यह योग होता है उन्हें इस तरह के उलटफेर के लिए हरदम तैयार रहना चाहिए.

घड़ीसाज के आगे इमानदारी से चलने वाली घडी उसकी सुधराई का पेमेंट कर घर लाने के बाद हार्ट अटैक हो कर बंद पड़ जाती है. “घड़ी सुधारते हो या मजाक करते हो?” कहते हुए उसके सामने घड़ी पटकने की देर है, घड़ी अपने दोनों काँटो को हिलाते हुए सही-सही चल रही होती है. यही है जलशृंखलायोग...और नहीं तो क्या ? इस योग पर जन्म लेने वाले लोगों को बार-बार ऐसे प्रसंगों को झेलना होता है. दरजी के यहाँ से सिलाकर लाया हुआ शर्ट गले में टाईट हो रहा है इसलिए वापिस ले जाने पर दरजी झट से ऊपर का बटन लगा कर गले और कॉलर में तीन उंगलियाँ फँसाकर घुमाकर बता देता है.... जलशृंखलायोग... और क्या !

 छुट्टी-अधिकारी योग  

स्वास्थ्य ठीक न होने का कारण दे कर छुट्टी मारी हो. ऑफिस में बीमारी की अर्जी भी दे दी गई हो. अब घर से रोज की तरह ऑफिस जाने का कहकर निकलो, घंटा दो घंटा शहर के सेफ एरिया में घूमते हुए टाईम पास कर दोपहर के शो में सिनेमा हॉल में जा कर बैठें हों. तभी ठीक आपके आगे वाली सीट पर बॉस बैठा हुआ दिखाई देता है. उससे बचकर केवल डॉक्युमेंटरी देख कर बाहर सटकने को हों और अँधेरे में किसी के पैर पर पैर गिर जाये, और तभी “आँखे फूट गई हैं क्या कमीने ? ” ऐसा अतिपरिचित स्त्री स्वर कानों पर आता है. वह स्वर आपसे छुपकर अपनी महिला मंडल की सखियों के साथ आई हुई अपनी पत्नी का होता है.  

अँधेरे में उसने तो नहीं लेकिन बॉस ने आपको देखा होता है. लेकिन वह भी कुछ नहीं कहता, क्योंकि इंस्पेक्शन के बहाने निकला बॉस भी अपनी सेक्रेटरी के साथ आया हुआ होता है. लेकिन छुट्टी-अधिकारी–योग के कारण आपकी फिल्म की भैंस पानी में गई होती हैं. लेकिन इसके बावजूद ऑफिस में नोकरी और घर में जान पर आँच नहीं आती.

घर जाने पर पत्नी कहती है “महिला मंडल में आज का व्याख्यान बड़ा ही बढ़िया हुआ”. अगले दिन ऑफिस में बॉस ट्रे में से चाय शेयर करने के लिए केबिन में बुलाता है और सेक्रेटरी अपने लंच बॉक्स में से एक सैंडविच आपके आगे करती है. यह योग आपको खाई के मुँहाने तक तो ले कर आता है लेकिन नीचे धकेलता नहीं है.  

इस योग पर जन्मा हवलदार सब-इन्स्पेक्टर की नजर बचाकर हाथभट्टी वाले से हफ्ता वसूली के लिए जाने पर उसे वहाँ अपना ही ‘’साब’’ पहली धार की लगाता हुआ मिलना ही चाहिए. भट्टी वाला दादा दोनों को पिलाता है. साहब सोचता है, हवलदार ने देख लिया, हवलदार सोचता है साहेब ने. भट्टी वाला दादा दोनों को चौकी पर सही सलामत लाकर छोड़ता है. उसी दिन एंटी करप्शन वाला भी वहाँ आया हुआ होता है. लेकिन वह भी कुछ नहीं कहता. क्योंकि अपने खुद के मुँह से आने वाली बू से खुद ही डरा हुआ होता है. पुलिस चौकी में दादा की अध्यक्षता में “आज कल पब्लिक कैसी हरामी होती जा रही है” इस बात पर चर्चा चलती है.

छुट्टी-अधिकारी–योग की वजह से संकट कबड्डी-कबड्डी करते हुए पास आता तो है लेकिन खिलाड़ी को छुए बगैर निकल जाता है.

(पु.ल.देशपांडे लिखित मराठी लेख "काही नवीन ग्रहयोग" का हिंदी रूपांतरण भाग-1... विवेक भावसार ) 
भाग -2 > https://funkahi.blogspot.com/2019/10/2.html
भाग-3 >  https://funkahi.blogspot.com/2019/10/3_26.html

Friday, June 14, 2019

स्फूर्ति रस

आज से लगभग नौ-दस वर्ष पूर्व लिखी रचना एक बार पुनः आपके समक्ष प्रस्तुत है !

बड़े बुजुर्गोसे भी सुना था और मैंने भी अपने बचपन में देखा है कि हमारे इन्दौर शहर की दिनचर्या काफी सुबह से ही शुरु हो जाती थी। सुबह की पाली के मिल मजदूर सुबह 7 बजने के पहले ही घरों से निकल जाते थे। सुबह-सुबह सड़कों की सफाई पूरी हो कर मशकों से उनकी धुलाई भी हो जाया करती थी । पूरे शहर के बाजार सवेरे 8-9 के दरमियान खुल जाते थे। बाहर गाँव का व्यापारी सुबह जल्दी आकर अपना सौदा कर के शाम के पहले लौट जाया करता था। चाहे दफ्तरोंमें चले जाईये या बैंकों में, अस्पतालों में या दुकानों में, जनता का काम लोग बड़ी फूर्ति से निपटा दिया करते थे।
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और अब आज का जमाना है, हर जगह कम्प्यूटर आ गये हैं, तेज रफ्तार का युग है फिर भी हर जगह सुस्ती, आलस और काम टालने की प्रवृत्ति का जोर है। बाजार देखो तो 12 बजे तक दुकानों के शटर ही खुलते हैं। दुकानों में जब झाडू लगती है तब सूर्य नारायण ठीक सर के उपर नब्बे डिग्री के कोण से निरीक्षण कर रहे होते हैं।
दफ्तर शुरू होने के निर्धारित समय पर पहुँच जाओ खाली टेबल-कुर्सियाँआपका स्वागत करती हैं। अफसर-कर्मचारी नदारद होते हैं। अस्पतालों में मरीजों की लम्बी कतारे लगी होती हैं परंतु जिन्हें सबसे पहले आ जाना चाहिये वो चिकित्सक ही सबसे अंत में आते हैं। यानी, हर जगह जिसे भी मौका मिलता है वह इस आलस और काम टालू प्रवृत्ति में अपना अधिक से अधिक योगदान देने में तत्पर रहता है । दिनों के काम महिनों तक, और महिनों में जो काम हो जाने चाहिये वह बरसों तक लटकते रहते हैं।
लेकिन यह सब कैसे सुधरे? इसे पटरी पर लाने का क्या उपाय हो सकता है? ....यहीं सोचते हुए मैं सुबह भगवान के सामने बैठा दीया-बत्ती-प्रार्थना कर रहा था और अचानक.....अचानक मेरे सामने स्वयं भगवान प्रकट हो गये और बोले-
"वत्स, तू जो सोच रहा है, बहुत ही अच्छा सोच रहा है। मैं भी चाहता हूँ मानव इस कुप्रवृत्ति से दूर हो । इस दुनिया को आलस और कामचोरी से मुक्ति दिलाने का उपाय मेरे पास है पर मैं अकेले इस काम को नहीं करुंगा। इसमें मुझे तुम्हारा भी सहयोग चाहिये।''
मैंने कहा " अवश्य भगवन् ! लेकिन मैं किस प्रकार से सहयोग दे सकता हूँ ?''
तभी भगवान ने जादूगर की तरह हवा में हाथ घुमाया और क्षणमात्र में एक कलश उनके हाथों में प्रकट हुआ। भगवान ने वह कलश मेरे हाथों में थमा दिया।
मैने पूछा '' ये क्या है प्रभु? मुझे ये क्यों दे रहे हैं आप ?''
भगवान बोले " तुम्हें आलस और कामचोरी की आदत से इस शहर को मुक्ति दिलाना है ना ? यह एक विशेष स्फूर्ति रस का कलश है। इस स्फूर्ति रस का सूक्ष्म से सूक्ष्म कण भी शहर के हर नागरिक के शरीर में पहुँच जाये तो सारा शहर स्फूर्तिमय हो जायेगा और तुम्हारी समस्या हल हो जायेगी। अब ये तुम्हे सोचना है कि यह काम तुम्हें कैसे पूरा करना है।''
इतना कहकर प्रभु अंतर्धान हो गये। इधर कलश हाथ में लेकर मैं सोचने लगा कि यह काम कैसे हो ? कईं विकल्प मन में आने लगे...सोचा हर घर जाकर इसे बाँटू, पर इसमें तो बहुत समय लग जायेगा और ये स्फूर्ति रस पूरा भी नहीं पड़ेगा।
फिर सोचा हर शहरवासी चाय तो पीता ही है, हर होटल, चाय के ठेले पर जाकर एक-एक बूँद चाय में मिलवा देता हूँ। परंतु हर शहरवासी तो होटल जा कर चाय पीता नहीं सो यह आइडिया भी छोडना पड़ा।
सोचते-सोचते कलश में डूबी अपनी उंगली उठाकर मैने मुँह में डाल ली। उस स्फूर्ति रस का जीभ पर स्पर्श होते ही ऐसा चमत्कार हुआ... कि अचानक आईडियों के भंडार खुल गये। कल्पना का घोड़ा वायुवेग से सरपट दौड़ा और कई तरकीबों की सैर करते हुए एक तरकीब पर आकर रुक गया।
मैंने मन ही मन कहा "मूरख सारा शहर जिस नदी-तालाब का पानी पीता है, तू इस कलश को उसी पानी में मिला दे। बस तेरा काम तो बन गया समझ !''
मैं तुरंत शहर को पानी की आपूर्ति करने वाले फिल्टरेशन प्लांट की ओर निकल पड़ा और वहाँ पहुँच कर चुपके से स्फूर्ति रस का पूरा कलश शहर में जाने वाले पानी में उंडेल दिया। "अब शहर के घर-घर में ये स्फूर्ति रस वाला पानी पहुँच जायेगा। पूरे सौ प्रतिशत ना सही 60-70 प्रतिशत नागरिक तो इसके प्रभाव में आ ही जाएंगे'' ये सोचते हुए खुशी-खुशी मैं घर आ गया।
और वाकई कुछ ही दिनों में असर सामने आ गया। सारे शहरवासी फूर्ति से ओतप्रोत हो गये। बाजार सुबह जल्दी खुलने लगे, दफ्तरों में सारे कर्मचारी समय पूर्व पहुँचने लगे। जिस काम की सरकार ने 15 दिन की समय सीमा तय कर रखी थी, लोगों का वह काम तीसरे ही दिन हो जाने लगा। गैस का नम्बर लगाकर घर आओ, पीछे से गैस सिलेंडर लेकर गैस वाला हाजिर ! बिजली, टेलीफोन की शिकायत-तत्काल हल। अदालतों में मुकदमों के सफाये होने लगे। बैंकों में फटाफट लोन पास होने लग गये। आरटीओ में हाथो-हाथ गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस बनने लग गये। अस्पतालों में मरीज के पहुँचते ही इलाज होना शुरू हो गये। नगर निगम में एक दिन में मकानों के नक्शे पास होने लगे, अन्य नागरिक शिकायतों का निराकरण भी तुरंत हो जाने लगा। कॉलेज की कक्षाओं में कोर्स समयपूर्व ही पूरे कर दिये गये। विश्वविद्यालय की परिक्षाएं भी समय पर सम्पन्न होने लगी, जिससे छात्रों के परीक्षा परिणाम भी समय पर आ गये।
फूर्ति रस ने ऐसा कमाल दिखाया कि हर दिशा में, हर विभाग में जैसे फूर्ति की प्रतियोगिता चल रही हो । जो पुल पांच-पांच साल में नहीं बनते थे, छः माह में पूरे होकर जनता के लिये खोल दिये गये। जिन सड़कों को बनने में दो-दो साल लग जाते थे तीन माह में पूरी होने लगीं।
इधर चोरों ने भी फूर्ति से चोरी करना चालू कर दिया, पर पुलिस ने उनसे भी ज्यादा फूर्ति से अपराधियों को पकड़ना चालू कर दिया। आखिर इससे तंग आकर अपराधियों ने अपराध करना ही छोड़ दिये।

होते-होते इसकी खबर पहले प्रदेश में, फिर सारे देश में फैल गयी और हडकंप मच गया। समाचार पत्र, टीवी चैनल, रेडियो, सब फूर्ति के किस्से बताने में लग गये। आखिर राजधानी में कुछ नेताओं के पेट में कुलबुलाहट सी होने लगी। पक्ष्-विपक्ष के इन सारे नेताओंने सोचा, अगर ये रोग सारे देश-प्रदेश में फैल गया तो बड़ी मुसीबत आ जाएगी, हमारा तो धंधा ही चौपट हो जाएगा।
आखिर इस मामले की जाँच के लिये सारे चिंतित लोगों की ओर से प्रदेश के मुखिया के समक्ष जाँच आयोग की माँग की गई। मुद्दों को लटकाने की सरकारी परंपरा के विपरित जाँच आयोग की मांग तुरंत मान ली गई। जाँच आयोग भी तय हो गया पर बाहरी जाँच आयोग जाँच में बहुत ही ज्यादा समय लगा देगा, इसलिये जाँच को स्फूर्ति युक्त शहर के ही किसी विशेषज्ञ से कराने का फैसला लिया गया, ताकि आम जाँचों के विपरित फूर्ति से जाँच हो और जल्दी से परिणाम सामने आए।

खैर, जाँच भी तुरंत चालू हुई और आशा के अनुरुप परिणाम भी जल्द ही सामने आ गया, कि....
"किसी स्फूर्ति रस मिले पानी पीने के परिणाम स्वरुप सारे लोगों में फूर्ति की यह धारा बह रही है," ...साथ ही जाँच में यह भी पाया गया कि “इन सबके बावजूद कुछ बड़े-बड़े लोग आज भी इस स्फूर्ति रस के प्रभाव से अछूते पाये गये हैं। इन महान लोगों ने अपनी सुस्ती और मक्कारी के सद्गुणों को बचाकर रखा है।" इन लोगों की गहन जाँच से सामने आया कि "यह सारे महान लोग तो कभी निगम द्वारा वितरित पानी पीते ही नहीं हैं। इनकी प्यास बुझाने के लिये घरों में कोल्ड्रिंक की बोतले या मिनरल वाटर की बोतलें भरी पड़ी है, और एक विशेष समय में ये तो पानी को हाथ भी नहीं लगाते।"
जाँच की मांग करने वाले नेताओं के हाथ जाँच का परिणाम पहुँचते ही सभी नेता इस विचार में व्यस्त हो गये कि इस फूर्ति प्रभाव को कैसे नष्ट किया जाय ? मैं भी उत्सुक था यह जानने के लिये कि अब ये सारे लोग क्या उपाय करते हैं।
इतने में मुझे श्रीमतीजी ने मेरे कंधे पकड़ कर जोर से हिलाया और लगभग चीखते हुए कहा-"" सुनते हो ? उठो...अरे कब तक सोते रहोगे ? दिन के 11-11 बजे तक सोये पड़े रहते हो । भगवान जाने, ये आदत कब जायेगी..... आज दफ्तर नहीं जाना क्या ? महिने की पहली तारीख है, सैलेरी लाना है कि नहीं ?'
.-स्वप्नानंद!
( विवेक भावसार)

Wednesday, June 12, 2019

आधुनिक अतुकांत कविता बनाने की रेसिपी

सोशल मीडिया पर इनदिनों कवियों की बाढ़ आई हुई है। कोई छंदबद्ध काव्य लिख रहा है तो कोई गीत. कोई शेर-ओ-शायरी में हाथ साफ़ कर रहा है तो किसी को आधुनिक कविता रचने की ललक सवार है। ऐसे में साधारण पाठक जिसे कविता का क भी लिखना नहीं आता, उसके मन में भी कविता रचने का शौक हिलोरे मारने लगता है। लेकिन सिद्धहस्त कवियों वाली वो बात, वो विचार, वो भाव कहाँ से लाये ? तो ऐसे ही मित्रों के लिए प्रस्तुत है एक अतुकांत कविता बनाने की रेसिपी। जब वो अतुकांत है तो आधुनिक अपनेआप ही हो जाती है, यह अलग से बताने की जरुरत नहीं ... तो चलिए बनाते हैं एक अतुकांत कविता.
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सामग्री:
 दो कोरे कागज, पेन, एक अंग्रेजी में आसान कहानी (शुरुआती / नए कवियों के लिये)।

विधि:
सबसे पहले अंग्रेजी की कोई आसान सी 15-20 वाक्यों की कहानी लीजिये। कोरे कागज पर कहानी के प्रत्येक वाक्य को अलग-अलग एक के नीचे एक लाईन छोड़ कर लिख डालिए। अब अंग्रेजी वाक्य के प्रत्येक शब्द का हिंदी अर्थ उसी शब्द के नीचे लिखते जाईए. याद रहे, किसी प्रकार का भावानुवाद आवश्यक नहीं है। व्याकरण, तुकबंदी, यमक, अलंकार आदि की चिंता मत कीजिए । सारे वाक्यों के अर्थ लिख लेने के बाद अब केवल हिन्दी अनुवाद को दोबारा दूसरे कोरे कागज पर लिख लीजिए. किसी विचित्र से, अच्छे से शीर्षक से उसे सजाइये। आवश्यक नहीं कि शीर्षक कविता के विषय से ही सम्बंधित हो। लीजिए आपकी ताजा-ताजा कविता तैयार है । तुरत किसी पत्रिका में प्रकाशन हेतु भेज दीजिए या सोशल मिडिया पर दोस्तों के साथ शेयर कीजिए। 50 - 75 कविता बना लेने के बाद कविता संग्रह भी निकाल सकते हैं, जो किसी महान पुरस्कार के पाने का आधार बन सकता है । कुछ सामयिक या सामाजिक विषयों पर कविता लिखना चाहे तो इच्छित विषय के समाचार का पेरेग्राफ अंग्रेजी के अखबार से लेकर इसी रेसिपी की सहायता से आप कोई क्रांतिकारी कविता भी बना सकते हैं ।


उदाहरण के लिए प्रस्तुत है एक आपकी परिचित कहानी –
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One hot day, a thirsty crow flew all over the fields looking for water. 
एक गर्म दिन, एक प्यासा कौआ उड़ा सब दूर मैदानो पर देखने पानी.
For a long time, he could not find any. 
बहुत देर, वह नही पाया ढूंढ कुछ भी।
He felt very weak, almost giving up hope.
वह महसूसा बहुत कमजोर, लगभग दी छोड़ आशा। 
Suddenly, he saw a water jug below him. 
अचानक, उसने देखा एक पानी का घडा नीचे उसके। 
He flew straight down to see if there was any water inside. 
वह उड़ा सीधे नीचे देखने क्या वहॉं था कुछ पानी अंदर ।
Yes, he could see some water inside the jug!
हॉं, वह सकता था देख कुछ पानी अंदर घड़े के। 
The crow tried to push his head into the jug. 
कौआ कोशिश करता रहा धकेलने उसका सर अंदर उस घडे़ में। 
Sadly, he found that the neck of the jug was too narrow. 
दुःखपूर्वक, उसने पाया कि गला घड़े का था बहुत संकरा। 
Then he tried to push the jug down for the water to flow out. 
तब उसने किया प्रयत्न धकेलू नीचे घड़ा कि पानी बहे बाहर ।
He found that the jug was too heavy.
उसने पाया कि घड़ा था बहुत भारी । 
The crow thought hard for a while. 
कौए ने सोचा गहन थोड़ी देर । 
Then looking around him, he saw some pebbles. 
तब देखा आसपास अपने, उसने देखे कुछ कंकर।
He suddenly had a good idea. 
उसने अचानक पाइ एक बढ़िया कल्पना।
He started picking up the pebbles one by one, 
उसने शुरु किये उठाने वह कंकर एक के बाद एक.
dropping each into the jug. 
डाले प्रत्येक को अंदर घड़े के.
As more and more pebbles filled the jug, 
जितने ज्यादा और ज्यादा कंकर, भर दिया घड़ा ।
the water level kept rising. 
पानी का स्तर बढ़ता रहा उपर।
Soon it was high enough for the crow to drink. 
जल्द ही था उंचा पर्याप्त कौए को पीने ।
His plan had worked!
उसकी कल्पना थी काम कर गई।
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यह है तैयार कविता -

गागर में कंकर 
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एक गर्म दिन, एक प्यासा कौआ उड़ा सब दूर मैदानो पर देखने पानी.
बहुत देर, वह नही पाया ढूंढ कुछ भी।
वह महसूसा बहुत कमजोर, लगभग दी छोड़ आशा।
अचानक, उसने देखा एक पानी का घडा नीचे उसके।
वह उड़ा सीधे नीचे देखने क्या वहॉं था कुछ पानी अंदर ।
हॉं, वह सकता था देख कुछ पानी अंदर घड़े के।
कौआ कोशिश करता रहा धकेलने उसका सर अंदर उस घडे में।
दुःखपूर्वक, उसने पाया कि गला घड़े का था बहुत संकरा।
तब उसने किया प्रयत्न धकेलू नीचे घड़ा कि पानी बहे बाहर ।
उसने पाया कि घड़ा था बहुत भारी ।
कौए ने सोचा गहन थोड़ी देर ।
तब देखा आसपास अपने, उसने देखे कुछ कंकर।
उसने अचानक पाइ एक बढ़िया कल्पना।
उसने शुरु किये उठाने वह कंकर एक के बाद एक.
डाले प्रत्येक को अंदर घड़े के.
जितने ज्यादा और ज्यादा कंकर, भर दिया घड़ा ।
पानी का स्तर बढ़ता रहा उपर।
जल्द ही था उंचा पर्याप्त कौए को पीने ।
उसकी कल्पना थी काम कर गई।
- विवेक भावसार