Tuesday, October 15, 2019

चाल









चाल व चलना !
  चलना क्या है? बताने की आवश्यकता नहीं... हर कोई जानता है कि पैरों को एक के बाद एक कदम जमाकर बढ़ाया जाता है उसे चलना कहते हैं। इसी चलने से चाल बनती है।
   पशुओं में एक जाति के पशु आमतौर पर अपने तरह के अन्य पशुओं की तरह ही चला करते हैं, उनकी चाल में कोई विशेष विविधता नहीं होती... जैसे सभी भैंसे अपनी सुस्त और बेफिक्र चाल से चला करती हैं, हिरण कुलांचे भरते हुए दौड़ते हैं, गिलहरी या चूहे अपनी तेज चाल के सहारे छोटी सी भी दूरी पार करते हैं, गधे भी भैंसों की तरह सुस्त चाल से चला करते हैं। भेड़-बकरियां बेतरतीब चला करती हैं. कहने का अर्थ यह कि प्राणी अपने- अपने जाति वर्ग में लगभग अपने अन्य जाती बंधुओं की तरह ही चला करते हैं।
   लेकिन मानव ही एक ऐसा प्राणी है जो कितने अलग-अलग प्रकारों से चलता है। बच्चा लगभग साल भर का होते ही चलने की कोशिश करने लगता है। उसके पहले कदम पर उसके माँ पिता कितने खुश होते हैं। बच्चे को एक चाल मिल जाती है। लेकिन मनुष्यों में यह चाल सभी की एक तरह की नहीं होती।
   किसी की चाल इतनी तेज होती है कि जैसे गर्म तवे पर कदम रख चल रहा हो (मुंबई जैसे महानगर के लोग अक्सर किसी लोकल ट्रेन को पकड़ने के लिए ऐसी ही चाल से चलते हैं)... तो कोई इतना धीमे-घिसटते हुए चलता है जैसे पैरों में वजन बांध रखे हों।
   कोई इस तरह उछलते हुए चलता है मानो राह में काँटे- कंकड़ बिछे हों ...तो कोई ऐसे चलता है मानो इनके पैर दलदल में फँसे हो ।
   कोई चलता है सधे हुए, नपे-तुले कदमों से ... तो किसी नशे में धुत्त शराबी का अगला कदम कहाँ गिरेगा, नहीं बताया जा सकता।
   किसी की चाल राजसी होती है, शानदार .... तो कोई इतना बेहूदा तरीके से चलता है कि देखकर हँसी आ जाती है। 
   अलग-अलग व्यक्तियों की यह विभिन्न चाल उनकी उम्र, शारीरिक अवस्था, बीमारी आदि की वजह से भिन्न-भिन्न हो सकती है।
   मनुष्यों की विशेष कर महिलाओं के चाल की तुलना कुछ पशु पक्षियों के चाल से की जाती रही है जैसे मोरनी की चाल, हंस की चाल, गजगामिनी, हिरनी की चाल, नागिन सी लहराती चाल आदि। भेड़चाल का भी उल्लेख कभी-कभी होता है लेकिन वह समूह को लेकर होता है। आत्मविश्वास से भरे दमदार कदमों को शेर सी चाल की उपमा दी जाती है। इससे पता चलता है कि मनुष्यों की चाल में कितनी विविधता पाई जाती है। कुछ पशु-पक्षियों की चाल का हमारे शास्त्रीय नृत्यों में बहुत सुंदर उपयोग किया गया है।
   व्यवसाय या अपने काम की वजह से भी किसी को एक विशिष्ट चाल अपनानी पड़ती है। इसका प्रमुख उदाहरण है, रैंप पर चलने वाली मॉडल्स। इनकी अजीब चाल देखो तो लगता है इनके पैर गलत जगह फिट करवा दिए गए हों। मानो बाएं पैर की जगह दायाँ और दाएं के स्थान पर बायाँ पैर लगाकर इन्हें चलाया जा रहा हो। अपनी चाल में विशिष्ट अदा-लचक लाने के लिए ऊंची एड़ी की जूतियाँ पहनने का चलन इन्हें अपनाना पड़ता है
   सैनिकों को भी परेड के समय एक विशेष चाल से कदम मिलाते हुए चलना होता है। किसी टुकड़ी के सैनिक अपने पैर कमर तक ऊँचे उठाते हुए कदम बढ़ाते हैं तो कहीं इससे कुछ अलग तरीके से चलते हैं, लेकिन एक ताल पर एक समान उठते कदम देखने में कितने अच्छे लगते हैं।
   समूह नृत्यों जैसे गरबा, बीहू, झूमर आदि में भी गोल घुमते हुए एक लयबद्ध चाल सभी नर्तक चलते हैं, जो देखने में सुन्दर लगती है. इसमें से किसी एक की भी बिगड़ी हुई चाल अन्य नर्तकों की चाल पर असर डाल सकती है. 
   चाल को फिल्मी गीतकारों को भी मोहित करने से नहीं छोड़ा है। चाल को लेकर गीतकारों ने कई गीत बना डाले हैं, तौबा ये मतवाली चाल... मारा ठुमका बदल गई चाल मितवा... चढ़ती जवानी मेरी चाल मस्तानी.... कान में झुमका चाल में ठुमका... जैसे गीत भी चाल में मतवाली, मस्तानी, ठुमकेवाली आदि चालों की विविधता की पुष्टि करते हैं।
   रिश्ता करने के पहले लड़के लड़की का चाल-चलन जान लेने का भी चलन है। लेकिन इस चाल-चलन में 'अच्छा' और 'बुरा' यही दो प्रकार हैं।
   एक चाल होती है जो दुश्मन को परास्त करने के लिए चली जाती है। यह चाल शतरंज के खेल से आई है और बहुतायत में राजनीति और सास बहू वाले tv सीरियलों में पाई जाती है। वैसे शतरंज की गोटियों के चालों की विविधता भी प्रसिद्ध है...आड़ा, तिरछा, सीधा, ढाई घर आदि चालें चलने वाली गोटें अपनी चालें मनुष्य को भी सीखा गई हैं।
   उधर कौए को हंस की चाल चलने पर उसका मजाक उड़ाया जाता है। कौओं की अपनी चाल कैसी भी हो लेकिन प्रश्न यह है कि यदि सारे कौवे हंस की देखादेखी उसकी चाल चलने लगे तो क्या ये भेड़चाल होगी या हंस की चाल?

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(मराठी मित्रांसाठी आठवले ... पु. ल. देशपांडे यांनी 'चाल' या विषयावर लिहिलेले -
"पूर्वीच्या काळी राजदरबारात कवींना एक चरण देऊन समस्यापूर्ती करायला लावत. मला कवितेतली ‘ओळ’ म्हणण्यापेक्षा कवितेतले चरण म्हटलेलं, एवढंच नव्हे तर गीताला ‘पद ’ म्हटलेलं अधिक आवडतं. चरण, पद, ह्या शब्दांतून ‘चालणं’ सुचवलं जातं. म्हणूनच पदाला ‘चाल’ येते. पहिली ओळ दुसऱ्या ओळीच्या शोधात चालायला लागते. टागोर म्हणतात त्याप्रमाणं यमकातून जुळणाऱ्या दुसऱ्या ओळीशी मीलन झाल्याशिवाय पहिलीच्या अस्तित्वालाही पूर्णता येत नाही. तसे आपण सारेच आपल्याशी जुळणाऱ्यांच्याच यमकांच्या शोधात असतो. वयाच्या निरनिराळ्या अवस्थेत जीवनाला परिपूर्णता देणारे अनुभव शोधत असतो. माणसं शोधत असतो. यमक, प्रास जुळणा-या ओळींसारखेच एकत्र येत असतो." )
-पदन्यासानंद !
(विवेक भावसार)

Thursday, October 10, 2019

कंधा


जिम्मेदारी उठाने के लिये काम आने वाला मानव का शरीर का एक अंग। (कभी-कभी यह काम सिर पर भी डाल दिया जाता है।)

देखें तो चौबीसों घंटे इसकी प्रमुख जिम्मेदारी ये होती है कि दोनों हाथों को अपने से लटका कर रखें, इसके अलावा भी कई जिम्मेदारियाँ कंधों के कन्धों पर रहती है।

वैसे तो हर एक के कंधे का साईज लगभग एक जैसा ही होता है लेकिन जिम्मेदारी से पता चलता है कि किसका कंधा कितना बड़ा है। कोई कंधा देश की जिम्मेदारी उठाता है तो कोई किसी विभाग या दफ्तर की । कुल मिला कर जहाँ जिम्मेदारी है वहाँ उसका आसन कंधा है। सत्ता के लिये कुर्सी आवश्यक है वही जिम्मेदारी के लिये कंधे जरूरी है। ये बात अलग है कि आगे चलकर आपकी गरदन जकड़ ले ऐसी संभावना वाली जिम्मेदारी धकेलने के लिये हर कोई उचित कंधे की खोज में लगा होता है।

किसी अफसर के चपरासी के कंधों पर जिम्मेदारी होती है कि किसी को भी सीधे- सीधे अफसर से मिलने के लिये रोका जाये, अफसर के कंधों पर जिम्मेदारी होती है कि किसी के आवश्यक कार्य जो केवल उसकी अनुमती से ही संभव होते हैं, उन्हें कैसे रोका जाय। इन्हें उचित ‘फीस’ चुकाकर इनकी जिम्मेदारी का बोझ कुछ कम किया जा सकता है।

यूँ तो जब आप घर से बाहर निकलते हैं तब यह कंधा कुरता, कमीज, कोट आदि भी टांगने के काम आता है, जिसमें ये जिम्मेदारी दोनों कंधे मिलकर उठाते हैं। लेकिन कोई झोला-छाता टांगना हो तो ये काम अकेला एक कंधा कर लेता है।

पुरातन समय में अपने ऊपर गदा धारण करने वाली शैली को आज के कंधे ने क्रिकेट का बल्ला धारण करने में परिवर्तित कर लिया है. हनुमानजी, भीम आदि वीरों के चित्रों में कंधे पर धारण की गई गदा की तरह बल्ले को कंधे पर धारण किये हुए क्रिकेटरों वीरों के चित्र नजर आने लगे हैं ! 

कंधे का एक काम और है, दूसरों के कंधे से मिलकर चलना। अक्सर किसी बड़े काम को कई लोगों के सहयोग से निभाना होता है तब किसी कंधे को दूसरे के कंधे से कंधा मिला कर चलना जरूरी हो जाता है। तब उनमें से कई चतुर कंधे ऐसे भी होते है जो अपना बोझ बड़ी खूबी से दूसरों के कंधों पर सरका कर बोझ उठाने का अभिनय कर रहे होते हैं। 

लेकिन देखा जाये तो वास्तविक रूप से कंधे से कंधा मिलाकर चलने की नौबत कुंभ मेले जैसी भीड़ में आती है. ट्राफिक जाम में फंसे बाईक सवार भी बगल वाले बाईक सवार के कदम से कदम और कंधे से कंधा मिलाते हुए चलते हैं  

पिछले कुछ दिनों से चर्चित इस फोटो ने कंधे का एक और उपयोग दुनिया को बता दिया है. विवाह के समय दिए गए सात वचनों में ससुरजी को अपनी भार्या का सम्पूर्ण भार उठाने के दिए हुए वचन का पालन करते हुए इस बलशाली बन्दे ने पतियों के प्रति पत्नियों की अपेक्षा बढा देने से दुनिया भर के पतियों की नींद उड़ा कर रख दी है. 

किसी के दुःख में उस का सर अपने पर रख कर उसका दर्द हलका करने वाले कंधा किसी को उसके जीवन के अंतिम पड़ाव तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी में भी शामिल होता है।
- व्याख्यानंद !
(विवेक भावसार)

Friday, October 4, 2019

दरवाजा



जो बारिश के दिनों में फूल जाता है और फिर जिसे खोलने-बंद करने में आपका दम फूल जाता है ऐसा घर के अंदर आने के लिये या दीवार से आर-पार जाने के लिये प्रवेश मार्ग।

दरवाजा असावधानीपूर्वक दरवाजा लगाया जाय तो उसमें उँगलिया आ जाने की संभावना होती है, और लगाया ही न जाये तो अड़ोस-पड़ोस के बच्चे घर में आ जाने की संभावना होती है। अपने यहाँ आ कर जम गये मेहमानों को बाहर जाने के लिये दरवाजा भी होता है, यह याद दिलाना पड़ता है। 

प्रवेश के लिए बंद होने पर दरवाजा तोड़ने की जिम्मेदारी सीरियलों में दया नामक पात्र पर होती है, लेकिन केवल नाम का यह 'दया', दरवाजा तोड़ने में कोई दया नहीं दिखाता। घर का दरवाजा तोड़ने में भले कोई कामयाब हो जाये लेकिन किस्मत का दरवाजा या दिमाग का दरवाजा न खुलने पर तोड़ देना किसी के बस की बात नहीं।

दरवाजे ने फिल्म वालों को भी शीर्षक उपलब्ध कराने में बहुमूल्य योगदान दिया है, जैसे ''दरवाजा'', ''बंद दरवाजा'', ''खूनी दरवाजा'' आदि आदि. ये बात और है कि फिल्म समाप्ती के बाद गेटमैन आपको बिना टिकट 'बाहर का दरवाजा' दिखा देता है।

आजकल इलेक्ट्रॉनिक तालों के या आपकी उँगलियों के निशान से खुलने वाले या केवल उसके सामने खड़े भर रहने से ही अपने आप खुल जाने वाले दरवाजे देखने में आते है। परन्तु इन आधुनिक दरवाजों पर इतराने की जरूरत नहीं क्योंकि केवल आवाज से खुल जाने वाले दरवाजे की बहुत पुरानी कहानी आपने भी सुन रखी होगी। याद कीजिये अलीबाबा और ४० चोर वाली कहानी, जिसमे अलीबाबा ने चोरों के सरदार से पासवर्ड 'खुल जा सिम सिम' चुराकर खजाने की गुफा का दरवाजा खोलने में सफलता पाई थी।

सोचनेवाली बात है कि अगर दरवाजा न होता तो हम अपने घर में कैसे जाते या बाहर आते ? इस संसार में जितनी भी मकानों की संख्या है उससे अधिक दरवाजों की संख्या है ! इसलिए दरवाजे का महत्त्व अनन्य साधारण है। हर इमारत में चाहे वह महल हो, किला हो, दुकान हो, मंदिर हो, सिनेमाघर हो, जेल हो या घर हो... इसका उद्देश्य केवल प्रवेश कराने से ही नहीं, प्रवेश करने से रोकना भी इसके काम में शामिल है। 

इसके अलावा कमरों के दरवाजों को एक जिम्मेदारी और निभानी होती है, अपने पीछे कपड़ों, जैसे कमीज, पैंट, पजामा, थैलियाँ आदि को टाँगे रखना. कन्धों पर तौलियों का भार संभालना भी इसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी में शामिल है।  इस तरह माना जा सकता है कि बिना दरवाजे के घर, घर नहीं हो सकता, क्योंकि दरवाजा ही नहीं होगा तो आप घर में घुसेंगे कैसे ?

व्याख्यानंद !

Friday, September 20, 2019

हेलमेट



पुलिसवाला कहीं चालान न बना दे इस डर से इसमें तुरंत सिर घुसाने की और अगर वह न दिखे तो दुपहिया के हत्थे पर टांगने की कमंडलनुमा वस्तु।

इसके सर में पहनने से दुर्घटना में सर का बचाव होता है ऐसा सरकार व पुलिस विभाग का मानना है। इसलिये इसके पक्ष में वह टीवी से लेकर रास्तों के किनारे लगे होर्डिंग तक इसका प्रचार करती है। लेकिन इसके पहनने से मुंह में रखा गुटखा थूकने में परेशानी होती है ऐसा वाहन चालक का मानना होता है। इसलिये गुटखा खानेवाले वाहन चालक इसे वाहन के हैंडिल पर टांग कर चलते हैं, साथ ही दूर से पुलिसवाले के दर्शन होती ही सर पर चढ़ा लेने की सावधानी भी बरत लेते हैं।

वैसे तो इसकी खोज बहुत पुरातन समय अर्थात रामायण-महाभारत काल में ही हो थी ऐसा गई प्रतीत होता है, क्योंकि तत्कालीन टीवी सिरीयल सीरियसली देखते रहने से पता चलता है कि युद्ध के समय योद्धा इसे अपने सर पर पहन लेते थे, ताकि अस्त्र-शस्त्र के वार से सर को किसी तरह की चोट न पहुँचे. उस समय इसे शिरस्त्राण ऐसा अत्यंत सरल नामकरण किया गया था. परन्तु मानव की कठिनाइयों को से खेलने की आदत के कारण इसे बाद में उच्चारण में अत्यंत कठिन नाम हेलमेट नाम से पुकारा जाने लगा. कुछ लोग इस नाम के पीछे आंग्ल भाषा का प्रभाव भी मानते हैं, जो कि पूरी तरह से आधारहीन है.

समय-समय पर पुलिस-प्रशासन की ओर से हेलमेट पहनने की सख्ती की मुहीम चलती है। और हर मुहीम की तरह यह मुहीम भी माह दो माह का जीवनदान पाकर मृत हो जाती है। सख्ती के चलते कभी पेट्रोल पंप पर बिना हेलमेट पेट्रोल नहीं देने के आदेश निकलते हैं पर चतुर चालक पांच मिनट के लिये किसी और का हेलमेट उधार ले कर आदेश की आंखों में धूल झोंकने में सफल हो जाते हैं।

इतनी परेशानियाँ होने के बावजूद प्राचीन समय से हेलमेट के कई फायदे गिनाये गये हैं, जैसे- जिससे कर्ज या उधार लिया हो तो हेलमेट लगाकर उसके सामने से बेधड़क निकला जा सकता है। प्रेमिका के साथ बैठ हेलमेट पहन कर गाड़ी चला रहे हों, तो न उसके, न स्वयं के परिवार द्वारा पहचाने जाने का खतरा होता है। गंजे लोगों के लिये तो वरदान है क्योंकि इसे लगाने से गंजापन छुपा रहता है। घर लौटते हुए साथ में थैली न हो तो हेलमेट हैंडल में उल्टा लटकाकर थैली के समान सामान भरने के काम लाया जा सकता है। हेलमेट और कान के बीच मोबाइल फँसाकर गाड़ी चलाते हुए मोबाइल से बात की जा सकती है। बेसुरे गीत गाते समय किसी के रोष का कारण नहीं बनना पड़ता क्योंकि हेलमेट लगाकर गाने से आपकी आवाज किसी और को सुनाई नहीं पड़ सकती और यदि सुनाई भी पड़े तो वह आपको पहचान नहीं पाता। हेलमेट पहने किसी का अभिवादन कर दो तो वह दिन भर सोचता रहता है कि नमस्ते करने वाला भला मानुस आखिर कौन था।

हेलमेट लगाने, न लगाने से किसी का फायदा हो न हो, इससे हेलमेट बनाने वाली कंपनियों का जरूर फायदा होता है, क्योंकि हेलमेट लगाने की सख्ती होते ही इनकी बिक्री में अचानक वृद्धि हो जाती है। इन दिनों यातायात नियमों के पालन में सख्ती और जुर्मानों में कई गुणा वृद्धि से हेलमेट पुन: चर्चा में है.

- व्याख्यानंद !

Wednesday, August 21, 2019

अखबार


अखबार
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रोज सवेरे जो बिना नागा बार-बार आपके घर टपक पड़े, समाचारों का ऐसा पुलिंदा।

वैसे बिना नागा आ टपकने वालों में इसे मांगने वाले पड़ोसी भी पाए जाते है, जो आपसे पहले समाचारों से अपडेट हो जाना चाहते है और लौटाते समय ये बताने से भी नहीं चूकते कि आज के अखबार में पढने लायक कुछ भी नहीं है।

अखबार की जरुरत सुबह-सुबह बड़े बुजुर्ग को पढ़ने से लेकर उस छोटे से बच्चे तक को पड़ती है, जिसे उस 'खास' जगह पर स्थान नहीं मिलता जहाँ बड़े जाकर निवृत्त होने के लिए बैठे हैं। हालाँकि कभी-कभी बड़े भी उस स्थान पर अपना अखबार ले जाते हुए पाए गए हैं। वहाँ इसका उपयोग वे उसे केवल पढ़ने के लिए करते हैं, ऐसा समझा जाता है। 

अखबार की जरुरत दिनभर दुकानदार को भी पड़ती है ग्राहक का सामान बाँधने के लिए, बच्चों को भी पड़ती है किताबों पर कवर चढाने के लिए, गृहणियों को भी पड़ती है अलमारी में बिछाने या काँच पोछने के लिए और रद्दीवालों को भी पड़ती है घर-घर जाकर मांगते फिरने के लिए। इस प्रकार एक अखबार पढ़ लेने के बाद बहुउपयोगी हो जाता है जिसे दादाजी से लेकर बहू, पढ़ने वाले बच्चे और अनपढ़ छोटे से बच्चे तक सारे इस्तेमाल कर लेते हैं।

समाचार पत्र, रिसाला या न्यूज पेपर के नाम से जाना जाने वाला यह अखबार अपने छपने से पहले तक खबरों के सूत्र, पत्रकार, स्तंभकार, कम्पोजर, प्रूफ रीडर, संपादक, प्रेस सुपरवाइजर आदि लोगों की चिंता का सबब रहता है. छपने के बाद वितरक और हॉकर की चिंता बन जाता है और मिलने तक पाठक की चिंता बना रहता है। मिल जाने के बाद भी पाठक की चिंता कभी-कभी इसलिए बनी रहती है की सबसे पहले खुद उसे पढ़े। इस तरह एक अखबार समाचारों के साथ-साथ चिंता का वाहक भी होता है जो चिंता को स्टेप-बाय-स्टेप आगे बढ़ाता रहता है और अंततः देश की चिंता करने का पुण्य श्रेय अपने सर ले लेता है। आश्चर्य की बात है कि एक दिन में दुनियाभर में इतनी सारी घटनायें घट जाती हैं फिर भी उनके समाचार एक अखबार में ठीक-ठीक समा जाते है और अपने साथ विज्ञापनों को भी पर्याप्त स्थान दे देते हैं। 

अखबार का एक महत्वपूर्ण घटक उसमें छपने वाले विज्ञापन हैं, जो अपने दाताओं का सन्देश पाठकों तक पहुँचाने का काम बखूबी करते हैं। एक कॉलम के छोटे से क्लासिफाइड विज्ञापन से लेकर फुल पेज भीमकाय विज्ञापनों से अखबार शोभायमान रहते हैं। कल्पना कीजिये किसी दिन अखबार में एक भी विज्ञापन न हो तो अखबार कैसा लगे ? मानो, बिना श्रृंगार किये कोई महिला सादे से लिबास में सामने आकर खडी हो गई हो। प्रॉपर्टी ब्रोकर्स की तरह ये विज्ञापन अपने सामान या सेवाओं के गुणों का बखान करने में ज़रा भी कंजूसी नहीं करते बल्कि नामालुम गुणों का भी बेहिसाब वर्णन कर जाते हैं। 

किसी समय केवल सुबह के समय टपकने वाले अखबार कुछ वर्षों से दोपहर में भी हाजरी बजाने लग गए हैं, जिससे दोपहर में समय व्यतीत करने के लिए परेशान लोगों को बड़ी राहत मिल गई है। ये लोग अखबार को शीर्षक से लगाकर प्रेस लाइन तक पूरा पढ़ लेने के बाद शब्द-पहेली सुलझाने में समय बिता देते हैं और फिर उसी में मुमफलियाँ छीलकर अखबार और समय का पूरा-पूरा सदुपयोग कर लेते हैं। दैनिक व दोपहर के अखबारों के अलावा साप्ताहिक और मासिक अखबार की भी एक किस्म होती है।

दैनिक अखबार रोजाना अपने संग सिटी न्यूज और पोल-खोलू छोटे भाइयों को भी ले आता है, ताकि जो स्थानीय समाचार मुख्य अख़बार में समाहित नहीं हो पाते उन्हें इन भाइयों के जिम्मे सौंप कर स्वयम का महत्व कायम रख सके। समय-समय पर मुख्य अखबार विशेष परिशिष्ट नामक अपने मित्र को भी आपसे मिलवाने ले आता है।

भाषाई अखबारों की तुलना में अंग्रेजी भाषा के अखबार सेहत के साथ खरीदने वाले के स्टेटस दिखाने में भी वजनदार होते हैं। ये अलग बात है कि इतने सारे पन्नों में से कितने पढ़े जाते हैं, और कितने अनपढ़े ही रद्दी की भेंट चढ़ जाते हैं। अंग्रेजी अखबार मुख्यतः घर से ऑफिस जाते समय कार की पिछली सीट पर बैठे-बैठे पढ़ने के काम आते हैं। 

आम दिनों में दुबले-पतले रहने वाले हिंदी अखबार नवरात्री, दिवाली जैसे त्योहार जैसे-जैसे नजदीक आते जाते हैं, सेहतमंद होते जाते है। इनका वजन और रंगीनीयत त्यौहार के आने तक दिनों दिन बढ़ती जाती है। रंगीन चिकने पन्नों पर जेवरों, कपड़ों, टीवी, वाहनों आदि के विज्ञापनों से इन पर अलग ही चमक छा जाती है। इन दिनों सुबह-सुबह आपके दरवाजे पर इनके टकराने की आवाज ज्यादा दमदार होती जाती है। कुछ दिनों की चांदनी अपनी चमक बिखेरने के बाद फिर लुप्त हो जाती है। इनकी सेहत का राज इन्ही विज्ञापनों में छुपा हुआ है। इन दिनों में यह समाचार-पत्र कम, विज्ञापन-पत्र ज्यादा लगने लगते हैं। 

रेडियो, टीवी, इंटरनेट-मोबाइल पर भले आप समाचार देख सुन लो, लेकिन सुबह की चाय के साथ अखबार में छपे हुए अक्षरों से सामना नहीं होता तब तक दिन की शुरुआत, शुरुआत नहीं लगती।

-व्याख्यानन्द (विवेक भावसार)

Tuesday, August 13, 2019

चाय पर चर्चा !


आइये अपने हाथों के कप आपस में टकरा कर बोलें .... चायर्स !
चाय..... सबसे ज्यादा पीया जाने वाला पेय। अंग्रेज इस देश में जाते-जाते बहुत सी चीजे छोड़ गए. बहुत सी व्यवस्थाएं, आदतें, भाषा, वेशभूषा, कुछ काले अंगरेज तथा साथ में और भी बहुत कुछ ! उनमें से एक है चाय ! हमारे आसपास शायद ही कोई ऐसा हो जिसने आज तक चाय न चखी हो।
चाय... जिससे हमारे दिन की शुरुआत होती है ! सिर्फ सुबह उठते ही नहीं बल्कि दिन में कई बार हम चाय के कप गटक जाते हैं ! किसी को हर घंटे-आधे घंटे में चाय लगती है तो कोई गिनती की ही चाय पीने वाले होते है ! किसी को खाने के पहले चाय लगती है तो कोई खाने के बाद चाय लेता है। तो कोई इतने शौकीन होते हैं कि उनको चाय के पहले चाय... और चाय के बाद में भी चाय जरूरी हो जाती है।
अंग्रेज जो सोफिस्टिकेटेड चाय छोड़ कर गए थे उसमें हम लोगो ने बहुत से प्रयोग कर के तरह-तरह की चाय बना डाली। कभी अदरख वाली चाय तो कभी इलायची वाली चाय.... कभी मसाले वाली तो कभी केसर वाली या लेमन ग्रास वाली । कभी गाढ़े दूध की रब्बाडी चाय..... पतली गर्म पानीनुमा चाय। इन सबके अलावा भी चाय के अलग अलग रंग हैं.... अभिजात्य वर्ग की ग्रीन टी हो या बिना दूधवाली काली चाय, नीम्बू वाली चाय, चाय की थैली कप में लटका देनेवाली चाय आदि।
चाय बनाने के तरीके भी अलग अलग, सड़क किनारे गुमटी वाला पहले से बने दूध-पानी के मिश्रण में शकर, चायपत्ती मिला कर उबालने का हो या घर में गैस पर पतीले में पानी चढ़ाकर क्रमश: अदरख, शकर, चायपत्ती और अंत में दूध मिलाकर चाय बनाई जाती हो। स्टार होटलों में एक केतली में उबला हुआ चाय का पानी और साथ में शकर, दूध को अलग-अलग पात्रों में दिया जाता है जिससे पीने वाले अपनी रूचि अनुसार बना कर पीते हैं.... तो ठेलों-होटलों पर गिलास में मिलने वाली चाय जिसका इन सब झंझटों के बिना सीधा आनंद लिया जा सकता है। इन ठेलों-होटलों पर मिलने वाली चाय को भी भिन्न-भिन्न नाम प्राप्त हैं। स्पेशल, टिमटिम, गुलाबी, बादशाही, बंगाली जैसे नाम अलग-अलग शहरों में प्रसिद्ध हैं।
कहीं चाय कांच के गिलास में पेश की जा रही है तो कहीं कुल्हड़ में, कागज के कप में या चीनी मिट्टी के कप में। चाहे जैसे इसे पेश किया जाए, चाय तो चाय है, शौकीनों की पसंद।
चाय पीने के अलग-अलग कारण हो सकते हैं। तरावट के लिए या सुस्ती दूर करने के लिए चाय पीना तो सर्वमान्य कारण है। किसी काम से उकता गए हों तो मूड बदलने के लिए चाय पी जाती है या रात में पढ़ते समय नींद न आने के लिए भी लोग चाय का सेवन करते है, किसी का सर दर्द करता है तो वह उस बहाने चाय पी लेता है, भूख दबाने के लिए पी लेता है या मेहमाननवाजी में मेहमान के साथ पी लेता है। चाय के बिना मेहमाननवाजी पूर्ण नहीं होती। मेहमाननवाजी का सबसे सस्ता तरीका है चाय।
दोस्ती का माध्यम भी है चाय। कोई दोस्त जब मिलने आता है तो कदम बरबस ही चाय के ठेले की ओर चल पड़ते है और चाय के साथ गपशप का आनंद लिया जाता है। चाय के लिए समय का या मौसम का भी कोई बंधन नहीं, गर्मी का मौसम हो तो सुस्ती भगाने के लिए, ठण्ड का हो तो ठण्ड दूर करने के लिए और बारिशों में पकौड़ों के साथ चाय का आनंद तो वर्णनातीत है ! किसी को चाय उबलती गर्म पीने की आदत होती है तो कोई ठंडी गार कर के पीता है। सबकी अपनी-अपनी पसंद।
इस चाय ने पता नहीं कितनों को रोजगार दिया है. शायद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले क्षेत्रों में से एक इसका नाम हो. चाय बागानों से लेकर वितरक, थोक-खेरची विक्रेता और चाय की छोटी सी दुकान-ठेला लगाने वाले तक। चाय की एक छोटी सी दुकान के सहारे अपने परिवार को पालते हुए बच्चों को पढ़ाकर बड़ा अफसर, इंजिनियर बनाए जाने के उदाहरण भी हमें देखने मिल जाते हैं। चाय की इन छोटी दुकानों पर दोस्तों के बीच चर्चाओं में से न जाने कितनी कल्पनाओं का सृजन हुआ होगा, जो बाद में वृहद आकार में साकार हो गई होंगी।
इन सब के बीच रेलवे की चाय ने भी पूरे भारत को एक सूत्र में बाँधने का फर्ज निभाया है क्योंकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक कुछ एक हो न हो .... भारतीय रेलवे की चाय एक (जैसी) है !
तो आइये एक बार फिर से अपने हाथों के कप आपस में टकरा कर बोलें .... चायर्स !
- चायसेवनानंद !

Wednesday, August 7, 2019

माझे अध्यक्षीय भाषण !


जेव्हां पासून र ला... फ, किंवा फ ला... ट न करता, ऊठ ला सूठ आणि रफा ला दफा अशी यमकं जुळवून कविता करायला लागलो व माझ्यासारख्या अनेक कविंसोबत मैफली गाजवल्या तेव्हांपासून माझी गणना नामवंत कवि म्हणून व्हायला लागली. मग अशातच अनेक गावातून कवि सम्मेलनातून आमंत्रणं येवू लागली. प्रसिद्धि वाढत गेली. वाढत वाढत इतकी वाढली की आता लोक मला कवि सम्मेलनाच्या अध्यक्षतेसाठी बोलवायला लागले. आता किती म्हटले तरी लोकांच्या आग्रहाला नकार देता येत नाही नां ! करता काय? मग अनेक वेळा अशा सम्मेलनांचे अध्यक्षपद यामुळे मला भूषवावे लागते.

आता अध्यक्षपद आलं की अध्यक्षांच भाषणही आलंच. आता प्रत्येक वेळी काय नि कसे भाषण करायचं म्हणून मी या भाषणाचा एक फार्म्युलाच तयार करुन ठेवला आहे. आता तुम्ही आपलेच, म्हणून मी हा फार्म्युला सांगतो तुम्हाला, न जाणो कधी तुम्हालाही अध्यक्षीय भाषण कराव लागलं तर, काय सांगता येतं, नाही कां ? 

त्याचं असं आहे, ज्या गावी निमंत्रण असेल, तिथली भौगोलिक परिस्थिती, नदी, नाले, टेकड्या, मंदिरे, तेथली प्रसिद्धि पावलेली ऐतिहासिक किंवा इतर क्षेत्रातील व्यक्तिंची माहिती हळुच कार्यक्रमा आधी निमंत्रकांना विचारुन घ्यावी. कारण या माहितीची भाषण देतांना फारच मदत होते. 

तर जेव्हांही असे भाषण देण्याची पाळी येते तेव्हां माइक वर आल्या आल्या सर्वात आधी माइक हलवून, खाली वर करून एडजेस्ट केल्या सारखे दाखवावे, म्हणजे श्रोत्यांवर आपण एक सराईत वक्ता असल्याची छाप पडते. त्यानंतर व्यासपीठावर बसलेले प्रमुख पाहुणे व इतर मान्यवर मंडळींना नमस्कार-चमत्कार, वंदन-अभिनंदन वगैरे नेहमीचे सोपस्कार करुन समोर बसलेल्या श्रोत्यांची स्तुति करुन टाकावी. पहिल्या ओव्हरलाच स्तुतिचा असा बॉल टाकला की श्रोते खुश होतात आणि मग तुमचे भाषण हूट वगैरे होण्याची शक्यता कमी होते. 

पुढे मग गावाची थोडी तारीफ करावी. गावातल्या एखाद्या ऐतिहासिक वास्तूचे, देवळाचे, नदी-तलावाचे, रस्त्याचे, गावात जन्मलेले कोणी महान संत, महापुरुष, साहित्यिक यांचे गुणगान केले की श्रोत्यांना मनातल्या मनात आनंदाच्या उकळ्या आणि हातांनी टाळ्या फुटू लागतात. मग मात्रा तुमच्या भाषणात अडथळा आणायची कोणाची काय बिशाद! 
 
नंतर...मूळ विषयाला हात घालण्यापूर्वी स्वतःबद्दल थोडे बढाईपूर्वक सांगावे. आपले लहानपण, बालपणातला हुडपणा, समंजसपणा, विद्यार्जनासाठी घेतलेली मेहनत, अडचणींना दिलेले तोंड, आपले प्रेरणा देणारे व्यक्ति, यांच्याबद्दल सांगावे. नंतर साहित्य क्षेत्रात कसा प्रवेश केला ते सांगावे. यामुळे श्रोत्यांच्या मनात आपली प्रतिमा मेहनती व अभ्यासू म्हणून दृढ होत जाते व श्रोते आपल्याला आदराने पाहू लागतात.

इतके सगळे बोलून झाल्यानंतर मूळ विषयावर यावे. त्या विषयाची माहिती आपल्याला असली तर उत्तमच, नाही तर काही थातूर मातूर बोलून मोकळे व्हावे. नाहीतरी श्रोते आपल्या पूर्वीच्या भाषणामुळे गपगार झालेलेच असतात. त्यांच्या कामाचे-स्तुतिचे त्यांनी ऐकून झालेले असते. शेवटी, एखादे संदेशपर वाक्य बोलून आपली एखादी रचना ऐकवावी व भाषण संपवावे.

सांगायला आनंद होतो कि हे जे गुपित आत्ता मी तुम्हाला सांगितले आहे, ते उघड होण्यापूर्वीच मोठ-मोठ्या साहित्यिकांनी-इतकेच काय आपल्या पंतप्रधानांनीही आपली अध्यक्षीय भाषणे या फार्मूल्याचा उपयोग करुन आपल्या सभा गाजवल्या आहेत. 

मला माहित आहे, हे सगळे तुम्हाला एखादे उदाहरण दिल्या शिवाय पटणार नाही. म्हणून मी एक माझाच अनुभव तुमच्या पुढे ठेवत आहे. मागच्याच महिन्यात मला मौजे डामरटवाडीला तेथल्या तिसऱ्या अखिल भारतीय वार्षिक कवि संमेलनाचे अध्यक्ष म्हणून आमंत्रण होते. गावाच्या नावाप्रमाणेच तेथले लोकही फारच डामरट आहेत. माझ्या कानावर होते कि आधीची दोन संमेलने या लोकांनी मोठ्या प्रयत्नाने उधळून लावली होती. पण माझ्या अध्यक्षीय भाषणाने मी अशी काही छाप सोडली कि संमेलन उधळून लावण्याऐवजी लोकांनी मलाच डोक्यावर उचलून धरले. नाही म्हणायला सुरवातीला एखाद-दुसरा लहानसा प्रयत्न झालाच उधळण्याचा.... पण मी काही दाद लागू दिली नाही. 

त्याच वेळचे माझे भाषण मी आता तुमच्या पुढे सादर करित आहे.

‘‘व्यासपीठावर विराजमान येथले लोकप्रिय आमदार व आजचे प्रमुख पाहुणे श्री बुचकेपाटिल, ज्यांनी माझी या अध्यक्षपदासाठी जोमाने शिफारस केली असे माझे परम मित्र डामरटवाडीचे संरपंच श्री सोमाजी टोणगे, आजचे विशेष पाहुणे आदरणीय श्री चावरे सर, मंचावर उपस्थित राष्ट्रीय कीर्तिप्राप्त माझे सारे कविमित्र श्री कोमल लवचिके ‘दगड’, कुमारी स्नेहल ‘प्रियकर’, श्री नरसू केकाटे ‘मधुर’, श्री रंगोबा बोचरे ‘काटा’, श्री काळू बेरड, श्री आंबुसराव तांदळे ‘स्वच्छ’ आणि डामरटवाडीतील सर्व रसिक, गुणग्राही, उत्साहवर्धन करणारी श्रोते मंडळी.

मित्रहो ! तुमची कवि संमेलनाबद्दल असलेल्या प्रेमाची, रसिकतेची कीर्ति आधीच माझ्या कानी आली आहे. कवि संमेलन म्हटलं की तुम्हा सर्वांना एक मनस्वी आनंद होतो हे मला ठाऊक आहे. या सम्मेलनाचं अध्यक्षपद मला देऊन आपण माझ्यावर जो लोभ व विश्वास व्यक्त केलात, त्या बद्दल मी आपला अत्यंत आभारी आहे. मराठी साहित्याच्या सेवकाला त्याच्या चाहत्यांच्या तर्फे मिळणारा हा एक मोठाच मान असतो. तो मान आपण मला दिलात, हा माझा नव्हे तर तुमचाच मान आहे असे मी समजतो. या मानासाठी नुसते शाब्दिक आभार मानून मी कसा उतराई होऊ. मी एवढंच सांगीन कि आजपर्यंत केलेली सर्व साहित्य सेवा तुमच्या सर्व रसिकांच्या चरणी अर्पण करतो. या क्षणी मला मच्छीकरांची एक कविता आठवत आहे. त्यांच्याच शब्दात सांगायचे म्हटले तर-
आणले चार मासे,
अर्पण करतो दोन तुला मी
उरले रे दोनच आता
चार सांगितले होते आणाया
घरी नेऊ मी हे कसे
तूच ठेव हे चारही मासे
आणले चार मासे.... 

असो, तर म्हणायचा अर्थ असा की माझी सर्व साहित्य सेवा तुम्हाला अर्पण केल्यावर माझे काय उरले, सर्व तुमचेच.

मित्रहो ! या मौजे डामरटवाडी गावाला फार थोर परंपरा लाभली आहे. गावाला वळसा घालून वाहत असलेल्या कळसा नदीचे पाणी पिऊन पिऊन मोठमोठ्या साहित्यिकांनी प्रेरणा घेतली आहे (उधळण्याचा प्रयत्न, श्रोत्यातून एक जण - अहो ... नदी नाही, नाला आहे तो नाला ) मी म्हणतो चला नाला तर नाला, यात पाणी वाहते आहे हे काय कमी आहे ? तर या अत्यंत पवित्र अशा कळसेच्या काठी असलेले नवसोबा भैरवाचे मंदिर तर आख्या भारतात प्रसिद्ध आहे. त्याच्या दर्शनाला फार लांबून लांबून म्हणजे पंचक्रोशितल्या सर्व गावांतून भाविक येत असतात. आमचे आदरणीय श्री बुचके पाटिल यांच्या प्रयत्नाने मागील पांच वर्षांपासून दरवर्षी भरणारी या भैरवाची 3 दिवसाची जत्रा नाशिकच्या कुंभमेळ्याच्या तोडीची असते. तर अशा थोर, महान व पौराणिक व पूर्वापार चालत आलेली परंपरा लाभलेली जत्रा भरणाऱ्या या भैरवाच्या नगरीत मला येण्याचे भाग्य लाभले हे मी माझे परम भाग्यच समजतो.

थोर अंतरराष्ट्रीय संत नारायणबोवा कीर्तनकार इथलेच, आसपासच्या दहा-बारा गांवांना आपल्या कीर्तनाने गाजवणाऱ्या संतश्रेष्ठ नारायणबोवांना विठ्ठलाचे नाव घेऊन मी श्रद्धापूर्वक नमन करतो.

विश्वकीर्ति लाभलेले आमदार बुचके पाटिल, ते ही येथलेच. वारंवार विधानसभेत अडथळा आणून टीव्ही कॅमेऱ्याच्या माध्यमाने प्रसिद्धिच्या झोतात येऊन देशप्रेमाचे उदाहरण घालून देणारे श्री बुचके पाटिल यांना मी अडथळा न आणू देता नमन करतो.

मागच्या दसऱ्याला तालुक्यातल्या सर्व पैलवानांना धूळ चारुन विश्व प्रसिद्धि पावलेले श्री बंडू दाणगट पैलवान देखिल या डामरटवाडीचेच. आलंपिक मधे भाग घेऊ इच्छित अशा नामांकित बंडू पैलवानांना मी लांबूनच नमन करतो.

वर्गात एकही दिवस न शिकवता पोरांना पास करत करत आठवीपर्यंत आणून पोचवणारे चावरे मास्तरही याच गावचे भूषण. आदर्श शिक्षकाचे राष्ट्रपति पदक मिळविण्यात थोडक्यात हुकलेले हरहुन्नरी अशा चावरे सरांना मी कान धरुन नमन करतो.

डामरटवाडी म्हटली की इथले भट्टी लावणारेे सोन्या गाळकर आठतात, संपूर्ण गावाला गाळून गाळून शुद्ध केलेले पेय पुरवणाऱ्या गाळकरांनी शुद्धतेचा एक आदर्शच गावापुढे घालून दिलेला आहे. खरे म्हटले तर यांना स्वच्छता मिशनचे ब्रांड अॅम्बेसेडर करायला कोणाची काहीच हरकत नसावी.

यानंतर लागलीच आठवण येते ती गान-नृत्यकला प्रवीण मंजूळाबाईं सतावकरीण यांची. आपल्या गायन व नृत्य कलेने अख्या महाराष्ट्रात धमाल उडवून लावणाऱ्या आणि भल्या भल्यांना घरदार सोडून देत सतावण्याइतके वेड लावून फड गाजवणाऱ्या जग प्रसिद्ध मंजूळाबाईंना, आणि त्या फडात आम्हाला पहिल्या धारेची पुरवणाऱ्या सोन्या गाळकरांसोबत फडात आम्हाला कायम साथ देणाऱ्या पोलिस पाटिल श्रीयुत खाशाबा जाधव यांनाही आम्ही गजरा बांधलेल्या हातांनी पेला उंचावून सलाम करतो.

तर सांगण्याचा अर्थ असा कि आज जरी शहरात रहात असलो तरी या गावातच आम्ही लहानाचे मोठे झालेलो आहोत. कळसा नदीचे पाणी आम्हीही चाखले आहे. (गर्दीतून एक जण- सोन्या गाळकरांच्या भट्टीत तेच वापरतात बरं का) .... तर याच गावात आम्ही चावरे सरांच्या मार्गदर्शनाखाली कोमल लवचिके, स्नेहल प्रियकर यांच्या मांडीला मांडी लावून कविता करायला लागलो. मला मिसरुड फुटायच्या आधीच माझी पहिली कविता फुटली ती चावरे सरांमुळेच. झाले काय कि पाचवीत असतांना वर्गात मी पाटीवर ‘माझी प्रिय कविता’ असे लिहून माझ्या मागे बसलेल्या कविता लुटपुटेला पाटी दाखवत होतो तेव्हढ्यात चावरे सरांनी पाहिले व वाचून दाणकन हातातले डस्टर पाटीवर फेकून मारले आणि अशा प्रकारे माझी पहिली कविता आणि पाटी बरोबरच फुटली. पण मी निराश न होता सरांचे उट्टे काढायच्या मिषाने... मिशा नसलेल्या सरांच्याच हजेरीपटाचे पान गुपचुप फाडून त्या कागदावर कविता लिहीली अन मग ती ‘कविताला’ दिली. ती माझी पहिली कविता अशी होती -

माझी प्रिय कविता,
मार सरांचा चुकविता !
झाली ओली विजार,
घातली तशीच न सुकविता !!
.....माझी प्रिय कविता

तर मित्रांनो, अशी माझी सुरवात झाली. बालपणापासूनच प्रतिभा समोर होती. कारण कविता मागे असायची. हळु हळु प्रगति होत गेली. प्रतिभा, कविता आणि प्रगतिमुळे व सरांचे मार्गदर्शन मिळत गेल्याने मी शेवटी एकदाचा कवि झालो. पुढे डामरटवाडीतून प्रसिद्ध होणारे शंभराच्यावर प्रसार संख्या असणारे मंजुळाबाईंचे देशप्रसिद्ध साहित्यिक मासिक ‘मंजुळ चाळे’ यांत त्यांच्या फडाच्या जाहिराती बरोबर माझ्या काही कविता छापून आल्या व साऱ्या जगाला माझी ओळख पटली. यात या सर्वांचे श्रेय आहे, प्रेम आहे.... म्हणूनच मी आज तुमच्यापुढे आज असा धडधाकट उभा आहे.
तसे पाहिले तर माझ्या साहित्यावर बऱ्याच लोकांची छाप आहे, तरी त्यात प्रमुख म्हणून नाव घेता येईल तर आमचे मुंबई-पुण्याचे बरेच प्रकाशक.... सुरवातीला माझ्या कविता मी मुंबई, पुणे येथील प्रसिद्ध प्रकाशकांना पाठविल्या, पण त्यांनी ‘नापंसत-साभार परत’ अशा शिक्क्यांचे छाप मारुन परत पाठविल्या. अशा प्रकारे त्यांनी माझ्या साहित्यावर आपली पहिली छाप पाडली. पण मी डगमगलो नाही. नंतर माझ्या मित्रांच्या सहयोगाने वर्गणी करुन मग मी त्या स्वतःच प्रसिद्ध केल्या. डामरटभूषण या पुरस्काराने मागील वर्षीच तुम्ही लोकांनी माझा या संग्रहाच्या निमित्ताने सम्मान केला आहे. आता स्वतःचीच काय सारखी स्तुति करावी. ते आता तुम्हां लोकांचे काम आहे.

माझ्या या भाषणाच्या शेवटी माझी एक कविता सादर करित आहे. या कवितेची चमत्कृतीपूर्ण अशी एक विशेषता आहे.... ती म्हणजे दोन दोन ओळींची कडवी आहेत, त्यातल्या दोन्ही ओळींचा शेवट एकाच शब्दाने केला आहे पण दोन्ही ओळीत त्या शब्दाचा अर्थ वेगवेगळा आहे.
उदाहरणादाखल आधी दोन दोन ओळींच्या काहीं स्वतंत्र रचना म्हणत आहे, त्यानंतर एक मोठी रचना प्रस्तुत आहे.
(भाषणासाठी तुम्हां सर्वांसमोर उभा राहून माझी काय अवस्था झाली आहे पहा या दोन ओळीत)

पाहून सर्व झालेले गोळा
उठतो रे पोटात गोळा


(ढोंगी साधू लोकांविषयी म्हटले आहे ज्यांचा वरचा देखावा वेगळा असतो आणि आतला कारभार वेगळा असतो, त्यासाठी दोन ओळी )

रामनाम जो भजे
तोच खाई रे भजे


(शेजाऱ्याची वस्तु मागून घेण्याचा शेजारणिचा शेजार धर्म पहा कसा असतो, त्यासाठी दोन ओळी )

दळावयास दे गं जाते
घेउनी मी ते घरीच जाते


(लांबचा प्रवास करुन घाम-धुळीने माखलेल्या चेहऱ्याने मित्राकडे आल्यावर)
कोण तू,? तो मला पुसे
मग मी ओशाळून तोंड पुसे

.
.
.
या दोन दोन ओळींनंतर याच धर्तीवर एक दीर्घ कविता प्रस्तुत आहे
थंडगार ही हवा
अशात गरम चहा हवा ।
मद्य बरे त्या परि
असे म्हणे ती मज परी ।
परी पुढे म्हणते -
जरी नसे तू मद्यपी
तरी एकदा हे मद्य पी ।
थंडी जरी असे तरी
आणते हे तर तरी ।
धरला कां ? हात सोडा
आणते मी बर्फ सोडा ।
थंडगार ही हवा
अशात मद्य चषक हवा ।
मी म्हणतो -
लागे हे अति चव दार
पण आधी ते लाव दार
पाहून विचारतील कोण प्याला
तरी दे अजूनी एक प्याला ।
कवटाळला हा चषक उरी
बाटलीत ना त्या काही उरी ।
थंडगार ही हवा
फक्त तुझा संग हवा ।
शेवटी संत तुकाराम महाराजांच्या शब्दात निरोप घेतो,
आम्ही जातो अमुच्या गावा
पुढचा पाठ तुम्हीच गावा ।
तुम्ही सर्वांनी माझे भाषण शांततापूर्वक ऐकले, भाषणामध्ये एकदाही टाळ्या वाजवून अडथळा आणण्याचा प्रयत्न केला नाही त्याबद्दल अनेक आभार आणि सर्वांना नमस्कार !
-अध्यक्षानंद !
(विवेक भावसार)

Tuesday, July 30, 2019

भूलभुलैया

मेरे पिता उनकी नौकरी के शुरुआती समय में  एक छोटे गांव में रहते थे। उन दिनों इतनी सुविधाएं नहीं हुआ करती थीं। इस वजह से एक बार ऑफिस की कैश कहीं देने खुद ही जाना पड़ा। रात का समय था। उन्हें जिस जगह जाना था, वहाँ जाने के लिए एक जंगल का हिस्सा पार करना होता था। रास्ते में क्या हुआ ये उन्हें याद नहीं, लेकिन रोजाना के रास्ते पर वो लगभग तीन-चार घंटे घूम रहे थे। वहीं के वहीं गोल-गोल चक्कर लगा रहे थे! तभी एक बैलगाड़ी वाला पास से गुजरने लगा, और तब जाकर वे बैलगाड़ी के सहारे जंगल पार कर पाए। उनका बताया वह संस्मरण आज भी हमें याद है, लगता है मानो वह हमारा स्वयं का अनुभव है।
ये जंगल की भूलभुलैया क्या चीज है, कहकर नहीं बताई जा सकती। कोई उस पर विश्वास करेगा, कोई नहीं भी करेगा। मैंने स्वयं कभी अपने जीवन में इसका अनुभव नहीं लिया। इसलिए इस पर कुछ कहने का मेरा कोई अधिकार नहीं। लेकिन आज जब घर का किराने का सामान खरीदने एक डिपार्टमेंटल स्टोर में जाना हुआ और एक ऐसी ही भूलभुलैया में फँसने का अनुभव हुआ।
ख़रीददारी की भूलभुलैया - आकर्षक रूप से सजी वस्तुएं, सामानों की वजह से अनजाने ही इन चीजों की ओर मन आकर्षित होता है। मेरी ट्रॉली कब भर गई पता ही न चला। पहले किराना सामान, फिर कपड़े दिखाई पड़े, महीने की खरीदारी में वे भी ट्रॉली में आ बसे। सरकार गला फाड़ चिल्ला रही.. प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें। लेकिन फिर भी करीने से सजी कुछ चीजें मुझे मोहित कर मेरी ट्रॉली में समा गईं। काँच के सामान रखी एक अलमारी से मेरी ट्रॉली हल्के से टकराई और मुझे मेरा बैलगाड़ी वाला मिल गया। बिलिंग काउंटर पर जाने से पहले दस मिनट शांति से बैठकर जो अनावश्यक सामान ट्रॉली में भर लिया था, निकाल बाहर किया और इस भूलभुलैया से बाहर आना हुआ।
मोबाइल की भूलभुलैया - सिर्फ एक मैसेज पढ़ने के लिए उठाया हुआ फोन, अपने आप घंटों तक हाथों से चिपका रहता है। फेसबुक - वाट्सएप की भूलभुलैया तो और भी खतरनाक। इससे भी खतरनाक यह कि इसमें हमें राह दिखाने गाड़ीवाले हमारे आसपास ही होते हैं, जैसे पत्नी, पति, माता, पिता, भाई, दोस्त। वे हमें टोकते हैं फिर भी हम इन बैलगाड़ीवालों पर ही गुस्सा होते हैं और वापिस इसी भूलभुलैया में फँस जाते हैं।
तीसरी भूलभुलैया है नींद या सोना - पाँच मिनट के लिए लेट जाओ तो घण्टाभर कैसे बीत जाता है, नहीं पता चलता। यहाँ भी अलार्म रूपी बैलगाड़ी है, लेकिन हम उसे आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं और बिंदास तान कर सो जाते हैं । दोपहर की नींद का भी यही हाल है। गलती से भी बिस्तर पर पीठ टिका दी तो समझो खो गए इस भूलभुलैया में।
टीवी चैनल्स की भूलभुलैया - इसके तो क्या कहने, 150-200 से ज्यादा चैनल्स ...ये पसंद नही आ रहा तो बदल दो चैनल। यहाँ मन नहीं रम रहा तो दबाओ बटन और कूदो दूसरे चैनल पर। एक फ़िल्म कम से कम 3-4 बार तो देख ही ली जाती है और परिणाम... 3-4 घंटे भूलभुलैया के नाम स्वाहा।
Sale... एक  खतरनाक भूलभुलैया - सेल में हमारे द्वारा ऐसी-ऐसी चीजें खरीद ली जाती हैं, जिनकी जरा भी जरूरत नहीं होती। 500 रुपये की बचत के लिए हम आसानी से 4-5 हजार रुपये खर्च कर डालते हैं और ऐसी वस्तुएं खरीद लाते हैं जिनके बगैर अगले 4-5 साल हमारा कोई भी काम रुकने वाला नहीं है। लो कपड़े, लो जूते, ले लो पर्सेस, भरो बैग्स और उड़ाओ पैसे।
क्रेडिट कार्ड की भूलभुलैया -  ये तो आज की दुनिया की सबसे वाहियात भूलभुलैयाओं में से एक। सिर्फ और सिर्फ अपनी जेब से तुरंत  पैसे नहीं जा रहे इस वजह से आसानी से हम इसे इस्तेमाल कर रहे हैं। अगले महीने की पहली तारीख को उसका बिल भरते हैं और अगले माह का वेतन आने तक कैश नहीं बचता इस लिए फिर क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। 
होटलिंग की भूलभुलैया- यह तो आजकल चक्रव्यूह है। घर खाना बनाने का आलस आये तो बाहर खाने चलो, घर के खाने से उकता गए तो बाहर खाने चलो। स्टार्टर्स अच्छे लगते हैं इसलिए बाहर खाना या वेरायटी के लिए बाहर खाना या ऐसे ही कुछ बर्गर-पिज़्ज़ा जैसे उटपटांग खाने के लिए बाहर का रुख करना। आजकल किसी को खाने पर न्योता देने पर भी उसे बाहर ले जाकर खिलाना। क्या वह स्वयं बाहर जा कर नहीं खा सकता?
कम्पीटिशन की भूलभुलैया - हर एक को दूसरे को दिखाने के लिए कुछ चाहिए। ये भूलभुलैया तो हमारी संस्कृति, मानव जाति के लिए घातक साबित हो रही है। कैसी यह जान लेने वाली स्पर्धा, वास्तव में इस मार्क्स, नम्बर्स की स्पर्धा के चलते कभी पालकों की, कभी बच्चों की या कर्ज चुकाने के चक्कर में माता पिता की जान तक जाने की नौबत आ जाती है।
व्यसनों की भूलभुलैया - किसी दोस्त के ऑफर करने पर कि एक कश या एक पेग से कुछ नहीं होता युवा सिगरेट या शराब की भूलभुलैया में कदम रख देते हैं। फिर व्यसन इस हद तक बढ़ जाता है कि लगता है इसके बिना एक क्षण भी जिया नहीं जा सकता। सिगरेट का व्यसन कहीं मादक पदार्थों के सेवन तक चला जाये तो जीवन और स्वास्थ्य का सत्यानाश निश्चित है। 
सोचने पर पता चलता है, मेरे पिता तो उस भूलभुलैया से 3-4 घण्टों में बाहर आ गए, लेकिन हमारा क्या होगा? इन सब भूलभुलैयाओं से हम कब बाहर आएंगे? सिर्फ एक अंतर है, यहाँ बाहर का बैलगाड़ी वाला उपलब्ध नहीं है। भूलभुलैया में फँसने वाले भी हम और हमें सचेत करनेवाले भी हम ही हैं। कितने ज़ख्म खाने के बाद या कितना कुछ खो देने के बाद इससे बाहर निकलना है, ये हमे ही तय करना होगा।
(सोनाली तेलंग की पोस्ट का हिंदी अनुवाद और सम्पादन )
- विवेक भावसार 

Friday, July 12, 2019

मच्छर


मच्छर .... सभा में आते ही तालियाँ बटोरने वाला एक गायनप्रेमी कीटक।
अनेक लोग ताली बजाने के बहाने मच्छर ही को मार डालने की कोशिश में रहते हैं, लेकिन यह कीटक अत्यंत चतुर होने से लोगों के हाथ न लगते हुए सफलतापूर्वक निकल भागता है। इसे मारने के चक्कर में कई बार लोग खुद को भी थप्पड़ मार लेते हैं।
घर से बाहर इसे ठंड-गर्मी की परेशानी ना हो इसलिये लोग सोने के समय मच्छरदानी बांधते हैं। फूल रखने के लिये जिस तरह फूलदानी या इत्र रखने के लिये इत्रदानी होती है, उसी प्रकार मच्छर रखने के मच्छरदानी होती है; जिससे मच्छर अंदर आकर सुकुन से गायन-वादन का अपना कार्यक्रम करते रहें। अपना श्रोता चैन से सो जाए ये इन्हें जरा भी मंजूर नहीं होता, इसलिये थोड़ी-थोड़ी देर में काटकर मच्छर उसे जागते रहने के लिए मजबूर कर देते हैं। इनके काटने में विशेषता ये होती है कि अगर ये गालों पर काट ले तो किसी बेशरम के गालों पर भी लाली आ जाती है।
श्रोताओं को गाना दूर से सुनाई नहीं देता इसलिये ये उनके कानों के समीप आ कर गुनगुनाते हैं। श्रोताओं के लिये इतना चिंतित रहने वाला गायक शायद ही कोई दूसरा हो। मानव जाति में जो गायक हैं उनमें से कितने श्रोताओं के कानों के पास जाकर गाते है, अगर इस बात का पता लगाया जाए तो निराशा ही हाथ लगेगी।
मच्छरदानी के अतिरिक्त मनुष्य ने मच्छरों से बचाव के लिये कई तरीके इजाद किये है जैसे- मच्छररोधी क्रीम, मच्छर अगरबत्ती, स्प्रे, गुडनाईट, बेडनाईट आदि आदि। देखा गया है, जैसे आतंकवादियों को रोकने की सरकारी कोशिशों का आतंकवादियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ठीक वैसे ही इन सारी अगरबत्ती-क्रीम्स का मच्छरों के आतंक पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।
एक टीवी विज्ञापन के अनुसार इनका घर में घुसने का समय ठीक छः बजे का होता है। चूंकि मच्छरों को घड़ी देखना नहीं आता इसलिये इनके आने का समय घंटा-आधा घंटा आगे-पीछे भी हो सकता है, इसलिये समय की गैरपाबंदी के लिये मच्छरों को दोष देना उचित नहीं होगा।
डॉक्टरों की भांति मच्छरों में भी स्पेशलिस्ट होते हैं। कोई साधारण मच्छर होता है जो केवल गुनगुनाकर निकल जाता है। किसी के काटने से मलेरिया होता है तो किसी डेंगू स्पेशलिस्ट के काटने से डेंगू नामक रोग होता है। कुछ मच्छर ऐसे भी होते है जिनके काटने से चिकनगुनिया रोग होता है, जिसके बाद कोई मनुष्य ताली बजाने लायक भी नहीं रह पाता।
डेंगू, मलेरिया उन्मूलन मुहिम में सरकार ने करोड़ों की संख्या में मच्छरों को नष्ट किया है। बीते पांच साल में कितने मच्छर सरकार द्वारा मारे गये हैं इसके आंकड़े पंचवार्षिक योजना के वार्षिक प्रतिवेदन में पढ़ने के लिये मिल सकते है या सूचना के अधिकार के जरिये भी प्राप्त किए जा सकते हैं। कहा जाता है कि यह आंकड़े सरकारी होते हुए भी सत्य हैं।
गहन अध्ययन एवं शोध का विषय है कि ये मच्छर पूर्वजन्म के आतंकवादी थे या आतंकवादी अपने पूर्वजन्म में मच्छर थे। दोनों ही संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। इन दोनों के बीच की कई बातों में समानता इस शंका को पुष्टि देती है।
देखिए उदाहरण -
➣ जिस प्रकार एक मच्छर पूरे बंदोबस्त के बावजूद मच्छरदानी में या घर के भीतर कोई सूराख ढूंढकर किसी तरह दाखिल हो ही जाता है, एक आतंकवादी भी देश की सीमाओं में से सूराख ढूंढकर देश में घुस ही जाते हैं।
➣ जिस तरह मच्छर एक अकेला नहीं आता उसी तरह आतंकवादी भी समूह में घुसने के प्रयास में रहते हैं।
➣ एक आतंकवादी किसी देश में लोगों के बीच छुपा रहता है और अवसर आने पर अपना काम कर जाता है ठीक उसी प्रकार मच्छर दिन भर घरों-कमरों के कोनों में छुपे रहते हैं और शाम होते ही अपने मिशन पर निकल आते हैं ।
➣ एक आतंकवादी लोगों के खून का उतना ही प्यासा होता है जितना की एक मच्छर। ये दोनों ही लोगों के खून के लिए अपनी जी जान लड़ा देते हैं, चाहे उसमें उनको अपनी खुद की जान ही क्यूं न गवानी पड़ जाए।
➣ मच्छरों की तरह एक आतंकवादी लोगों की अमन, चैन, शांति का दुश्मन होता है । आप शांतिपूर्वक कहीं बैठे हो, ये इनको नहीं सुहाता और ये आपकी शांति भंग करने पहुँच ही जाते हैं ।
➣ दोनों के शिकार मासूम और निहत्थे लोग ही होते हैं ।
➣ ये भी होता है कि गाल पर बैठे मच्छर को मारने के लिए स्वयं को ही चाटा खाना पड़ता हो उसी प्रकार देश में छुपे किसी आतंकवादी को पकड़ने में किन्हीं निरपराध लोगों को भी बली चढ़ जाती है ।
➣ जिस प्रकार एक मच्छर पकड़ में आने पर कोई उसे जिंदा नहीं छोड़ना चाहता, यही गत आतंकवादियों की भी होती है । कोई नहीं चाहता कि शांति और अमन के दुश्मन आतंकवादी को जिंदा छोड़ दिया जाए, बल्कि मच्छरों की तरह इन्हें भी मसल कर रख दिया जाए।

- व्याख्यानंद (विवेक भावसार)

Friday, July 5, 2019

आधुनिक मेघदूत (मराठी)




धोकादायक सूचना - खाली लिहिलेल्या कथेतली नावे, स्थळे, शीर्षक अथवा घटना इतर कोणत्याही गोष्टीशी जुळत असतील तर तो निव्वळ योगायोग नाही, फार प्रयत्नपूर्वक तसे केलेले आहे.

आधुनिक मेघदूत 


ही गोष्ट मला माझा मित्र (खालच्या मजल्यावर राहणारा म्हणून ) खालीदास याने खाली (रिकाम्या) वेळेत सांगितलेली आहे. ती मी जशीच्या तशी तुम्हाला सांगायचा प्रयत्न करीत आहे.

आपल्या या कथेचा नायक आहे सेल्स एक्ज्यूकेटिव म्हणून कुबेर फायनांस कंपनीत नोकरी करत असलेला एक तरुण युवक "दक्ष"कुमार. दक्ष कुमार आपल्या कंपनीच्या मालकांचा आवडता कर्मचारी. आणि हा 
दक्षही मोठ्या इमाने इतबारे कंपनीच्या सेवेत झटत असे. अशातच दक्ष कुमारचे लग्न झाले. चांगल्या कंपनीत छानश्या हुद्यावर असल्याने बायकोही त्याला अति सुंदर व प्रेमळ अशी मिळाली. नवे नवे लग्न झालेले होते. नव्या नव्या नवरा-बायकोचे प्रेम नको इतके उतू जात असतेच. त्या परंपरेनुसार दक्षसुद्धा बायकोचे लाड पुरवण्यात गुंग असायचा. रोज रोज हॉटेलात जेवू घालणे, दर आठवड्याला एखाद्या मॉलमध्ये फेरफटका, शॉपिंग व नंतर सिनेमा पाहणे असा त्यांचा प्रेमळ नित्यक्रम चाललेला होता. 

दक्ष आपल्या नव्या बायकोच्या इतक्या प्रेमात पडलेला होता की कंपनीच्या कामाचाही त्याला कधी कधी विसर पडू लागायचा. अशाच एके दिवशी आफिसात एक फार आवश्यक अशी सेल्सच्या स्टाफची मीटिंग होती. आणि त्या मीटिंगला नेमका दक्ष हजर नव्हता शिवाय एक अर्जंट फाईलही त्याने आफिसात आणून दिलेली नव्हती. आफिसतर्फे त्याच्या मोबाईलवर फोन करून विचारणा झाली तेव्हां तो बायको सोबत शॉपिंगसाठी बाजारात असल्याचे कळाले. कंपनीचे मालक श्रीयुत कुबेर ह्यांना ही बातमी समजली. ते फारच नाराज झाले. ताबडतोब त्यांनी दक्ष यास हजर राहण्याचे फर्मान काढले. त्यानुसार दक्ष तातडीने आफिसमध्ये मालकांच्या समोर हजर झाला.

अत्यंत महत्वाची मीटींग सोडून बायकोसोबत शॉपिंग करत फिरत असल्याने कुबेर सर त्याच्यावर भयंकर संतप्त झाले होते. आणि त्यासाठी शिक्षा म्हणून तडकाफडकी त्याची बदली लांबच्या प्रदेशातल्या रामटेकनगर या गावी केली. तेथे त्याला एकटेच जावे लागणार होते. तेथे टारगेट पूर्ण होईस्तोवर त्याच्या बायकोपासून लांब रहावे लागणार होते. मोठ्या दुःखी मनाने तो तेथून घरी परतला. अत्यंत जड अंतःकरणाने ही बातमी त्याने बायकोच्या कानावर घातली. बातमी ऐकून बायकोसुद्धा विरहाच्या विचाराने मोठी कष्टी झाली. 

गावी जायची तयारी करुन झाली. "रोज सकाळ-संध्याकाळ मोबाईल, व्हॉट्स एपवर आपण बोलत जाऊ, तेव्हढीच विरहाची व्यथा कमी होईल ' अशी तिची समजूत घालून दक्षने बायकोचा निरोप घेतला आणि जायला निघाला. रामटेकनगरला पोचल्यावर त्याने पहिले छूट बायकोला पोचल्याचा फोन केला.

धीरे धीरे तो आफिसच्या कामात रुळू लागला. बायकोबरोबर रोज सकाळ -संध्याकाळ फोनवर बोलणेही चालुच होते. नुसते बोलून काय होते ?  बायकोचा विरह त्याच्या मनात सारखा सलत होता. अचानक एक दिवशी बायकोचा मोबाईल लागेना असे त्यास समजून आले. दक्षाने बराच वेळ प्रयत्न करुन पाहिला पण साफल्य काही तयाच्या हाती लागले नाही. दुसरे दिवशीही तोच प्रकार घडला. दक्ष प्रयत्न करून करून थकला पण त्याला काही यश लाभले नाही. कदाचित तिच्या मोबाईलचा बॅलेंस संपलेला असेल किंवा बॅटरी डिस्चार्ज झालेली असणार म्हणून त्याने मनाची बरीच समजूत काढली पण त्या दिवसानंतर कधीच त्याचे बायकोशी बोलणे झाले नाही, इतके मात्र खरे.

बायकोच्या विरहाने आपला दक्ष खुपच झुरत चालला होता. तिच्याशी सकाळ -संध्याकाळ मोबाईलवर होणारे बोलणेही खुंटले होते. दक्षाचे कामात लक्ष लागेना, जेवणात लक्ष लागेना. त्याचे कशातही लक्ष लागेना. त्याचे सहकारीही "दक्ष का नही काम में लक्ष' असं म्हणून चिडवू लागले. दक्ष मनाने आणि शरीराने खंगू लागला. फारच विचित्र अवस्था झाली. त्याचे कपडे त्यास सैल होवू लागले. पँट तर कंबरेत इतकी सैल झाली की आपोआप खाली गळून पडत असे, शेवटी त्याला कंबरेच्या पट्ट्यात एक्स्ट्रा भोकं मारून पट्टा आवळण्याची व्यवस्था करावी लागली.

करता करता पावसाळा जवळ आला. आकाशात काळे काळे ढग धावू लागले. लग्नानंतरचा पहिला पावसाळा. दक्ष बायकोच्या विरहाने अत्यंत व्याकुळ झाला. तिच्याशी नुसते बोलायचे म्हटले तर तो ही मार्ग खुंटला होता. आषाढाचा पहिला दिवस उगवला. बायकोला संदेश कसा पाठवावा याचा विचार करता करता त्याला एक मार्ग सुचला. त्याने कागदावर एक मोठे प्रेमपत्र लिहून काढले. आणि ते पत्र एका पाकिटात घालुन त्यावर आपल्या घरचा म्हणजे "प्रेमसदन", 63, अलकापुरी कॉलनीचा व पाठविणारा (स्वतः)चा पत्ता व मोबाईल नं सकट "VERY ARGENT " लिहून ते पाकिट त्वरित रवाना व्हावे म्हणून ‘गगन' कोरियरला नेऊन दिले. कोरियर कंपनीनेही ते पत्र तातडी पाहून लगेच पहिल्या डाकेने रवाना केले .

पत्र लवकरच दक्षाच्या गृहनगरातल्या कोरियर कंपनीच्या शाखेत येऊन पडले. पत्र दिलेल्या पत्यावर नेऊन देण्याची जवाबदारी "मेघकुमार' या कोरियरबॉय वर आली. मेघकुमार त्या भागातल्या बाकीच्या पत्रांसोबत दक्षाचेही पत्र घेऊन त्याच्या घरी देण्यास निघाला. त्या भागात मेघाचे फारसे येणे जाणे नसल्याने त्याला दक्षाच्या घरचा पत्ता सापडला नाही, म्हणून घरापर्यंत जायचा मार्ग नीट समजून घ्यावा या उद्देशाने त्याने पत्र पाठविणाऱ्याला अर्थात् दक्षाच्या मोबाईलवर फोन लावला. दक्षाने विचारताच त्याने आपला परिचय दिला व घरचा पत्ता शोधण्यास येत असलेली अडचण सांगितली व पत्ता नीट समजावून सांगण्याची विनंती केली.

तेव्हां दक्ष त्यालाम्हणाला - हे मेघ, तुझ्यावर ही फार महत्वाची कामगिरी मी सोपविली आहे. तुझ्या हातात असलेले पत्र हे मी माझ्या प्रिय पत्नीला लिहिले आहे. तू लवकरात लवकर हे पत्र तिच्या हातात पडेल असा प्रयत्न कर. कारण ती माझ्या विरहात दु:खी होवून तळमळत असेल. तिला माझी खुशाली लवकर समजली तर तिला बरे वाटेल. हे मित्रा तू सध्या कुठे उभा आहेस?

तेव्हां मेघकुमारने उत्तर दिले - ''हे दक्षा, मी सध्या प्रत्येक शहरात हटकून असणाऱ्या महात्मा गांधी रोड नामक रस्त्यावरच्या शिवाजी पुतळ्याच्या चौकात उभा आहे. कृपया मला मार्गदर्शन करावे.''

दक्षाने त्याला रस्ता समजाविण्याच्या उद्देशाने पुढील कथन केले - ''मित्र मेघा, तू अगदी योग्य अशा ठिकाणी उभा आहेस, येथून तुला पत्ता शोधण्यास मुळीच श्रम पडणार नाहीत. केवळ माझ्या निर्देशांचे पालन कर.''

दक्ष पुढे म्हणाला,

''हे मेघदूता, तू शिवाजी महाराजांच्या मुखाच्या दिशेने मुख्य रस्त्यावर सरळ चालु लाग. सरळ पुढे चालता चालता तुला डाव्या हाताला तिसऱ्या गल्लीच्या कोपऱ्यावर मिल्क पार्लर नावाची एक टपरी दिसेल. तेथे दूध सोडून इतर सर्व पदार्थ ब्रेड, बिस्किट, अंडी, फरसाण, सिगारेट, चॉकलेट्स, गुटखा, बेक्ड सामोसा इत्यादी हारीने मांडून ठेवलेली दिसतील. पण मित्रा तू त्यांच्याकडे मुळीच लक्ष देऊ नको. तू ती गल्ली सोडून चवथ्या क्रमांकाच्या गल्लीत शिर. त्या गल्लीत शिरल्यानंतर तू तसाच पुढे चालु लाग. बरेच पुढे गेल्यावर तुला तेथे रस्त्यावर नगरपालिकेने पाईप दुरुस्तीसाठी खणलेला एक मोठा खड्डा आढळेल. मला खात्री आहे कि सहा महिन्यांपूर्वी खणलेला तो खड्डा अजून नगर पालिकेने बुजवलेला नसणार. मित्रा तू त्या खड्यात मुळीच उतरु नको, कदाचित त्यात आतापर्यंत बराच चिखलही साचलेला असणार. तू तो खड्डा ओलांडून पुढे जा. "

थोडे थांबुन दक्ष परत म्हणाला,

"पुढे गेल्यावर उजव्या बाजूच्या कोपऱ्यावर एक रिकामा प्लॉट दिसेल. त्यात आजूबाजूच्या लोकांनी टाकलेला कचऱ्याचा साचलेला भलामोठा ढीग दिसेल व त्याची भयानक दुर्गंधीही सुटलेली असेल. तेव्हां तू असं कर मित्रा, ताबडतोब आपल्या खिशातला रुमाल काढून लगेच नाकावर धर आणि तो कचऱ्याचा डोंगर डावलुन उजव्या दिशेला प्रयाण कर. उजव्या दिशेने पन्नास कदम पुढे गेल्यावर एक रुंद रस्ता दिसेल. त्या रस्त्याच्या डाव्या हाताला "अवंतिका' कन्या महाविद्यालयाची महालासदृष्य भव्य इमारत दिसेल. मित्रा जर तू सकाळी दहाच्या सुमारास किवा दुपारी तीन वाजेच्या जवळपास तेथून जात असशील तर अनेक सुंदर, सुकुमार कुमारिकांचा ताफा त्या रस्त्यावरुन लचकत, मुरडत चालत असलेला दिसेल. अर्थात त्या घोळक्यामागे नवतरुणांची एखादी टोळीही मुखाने शीळ घालत किंवा शब्दबाणांनी छेडत त्यांचे अनुसरण करतांना आढळेल. मित्रा, तू दोन घटका रस्त्याच्या कडेला उभा राहून परत परत स्मितपूर्वक मागे वळून पाहून त्या तरुणांना उत्तेजन देणाऱ्या कमनीय तरुणींचे दर्शन कर. जमलं तर एखादी शीळ तूही घाल. थोडा विसावा घे आणि पुढे निघ.

चालता चालता तुझा कंठ शुष्क झाला असणारच. महाविद्यालयाच्या पुढच्या कोपऱ्यावरच एक पाणपोई आहे. तू तेथे थांबून आपली तृष्णा शांत कर. जवळच असलेल्या हिमालय हॉटेलात मिळणारे अमृततुल्य चहापेय घ्यायला तुला नक्कीच आवडेल. चहापानानंतर मित्रा तू ताजातवाना होऊन पुढचा मार्ग आक्रमु लाग. त्याच दिशेने पुढे पुढे वळण न घेता तू चालु लाग. लगेच तुला एक मोठे मैदान आढळून येईल. पूर्ण मैदानभर उकीरड्याच्या ढिगाऱ्यामधून विचरण करणारे वराह अर्थात डुकरांचे कळपच्या कळप तुला दिसून येतील . मैदानातल्या खोल जागेत पाणी किंवा चिखल साचलेला असेल तर त्यात डुंबत आनंदाचा आस्वाद घेणाऱ्या म्हशीं आणि त्यांच्या मागे पुढे फिरणाऱ्या शुभ्र धवल बगळे आणि काळे कुळकुळीत कावळे नामक पक्षीकुलाचे दर्शन घेण्याचे भाग्यही तुला लाभेल.''

दक्ष पुढे सांगत राहिला,

''हे मेघदूता, मैदान मागे टाकून तू किंचित पुढे आल्यास एक मोठा चढ दिसेल. त्या टेकडीवर चढून आल्यावर तुला थंड हवेची एखादी झुळुक येवून आदळेल. तर मित्रा तू मुळीच घाबरुन जाऊ नकोस. कारण अलकापुरी कॉलनीच्या अगदी जवळ तू येऊन ठेपला आहेस. चढ संपताच डाव्या बाजूस कॉलनीचे प्रवेश द्वार आहे व तेथेच अलकापुरीचा नामदर्शक फलक उभारलेला आहे. त्या प्रवेशद्वारातून आत शिरल्यावर रस्त्यात उभ्या असलेल्या गाई, म्हशींना चुकवत मित्रा, तू सहाव्या क्रमांकाच्या गल्लीच्या कोपऱ्यावर जा. तेथे एक नगर पालिकेने ठेवलेली कचरापेटी दृष्टीपथात येईल. सगळा कचरा त्या पेटीच्या आत असण्याऐवजी चारीबाजूला विखुरलेला आढळून येईल. तेथे बसून कचरा विचकणाऱ्या कुत्र्यां, डुकरांपासून अत्यंत हुशारीने आपला बचाव करत तू गल्लीत प्रवेश कर.
गल्लीत पुढे आल्यावर कैलासपति श्रीशंकराचे एक देऊळ तुला दिसेल. तू देवळात जाऊन श्रीशंकराचे दर्शन घे.

भगवान महादेवाचे दर्शन घेऊन बाहेर आल्यावर समोरच 63 क्रमांकाचे प्रेमसदन नावाचे माझे घर आहे. तू तेथे परिसराचे द्वार ओलांडून प्रवेश कर, पण एकदम द्वारघंटिका वाजवू नकोस. कदाचित् माझी प्रिय पत्नी निद्रावस्थेत असेल. कदाचित् ती माझ्या स्वप्नरंजनामध्ये गुंग असेल. द्वारघंटिकेच्या ध्वनिने तिच्या स्वप्नांत व्यवधान पडेल. तू हळूच बाजूच्या गवाक्षातून वाकून पहा. जर माझी प्रिया जागी नसेल तर तिच्यावर तेथुनच बाटलीतले पाणी घेऊन हलक्या हाताने शिडकाव कर. ती निद्रावस्थेतून बाहेर आल्यावर मित्रा तू माझे हे पत्र तिच्या स्वाधीन कर आणि मग वाटल्यास तुझी बाकीची पत्रे वाटायला खुशाल जा.''

- पथप्रदर्शनानन्द !
(विवेक भावसार)